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रविवार, 21 अप्रैल 2013

प्रसव पीड़ा


“हेलो सर जी! क्या चल रहा है!”
“अरे कुछ नहीं, बताइये!”
“एक मजेदार कांड हो गया. पता है......!”
लगभग अइसहीं हम दुनो का बात चीत सुरू होता है. अब इसमें संबाद का अदला बदली भी आम बात है. डिपेंड करता है कि फोन किया कउन है. केतना बार उनका फोन आया त हम बोले कि पूछिए मत लेबर पेन से छटपटा रहे हैं.
“कोई बात नहीं, सलाइन चलने दीजिए, डिलीवरी नोर्मल होगी!”
एतने नहीं, आधा एक घंटा के बाद फिर पूछेंगे, “क्या हुआ?”
“बस हो गया!”
“तो चलिए मुँह दिखाइए! इरशाद”
अऊर इसके बाद सुरू होता है सिलसिला चैतन्य बाबू को फोन पर पोस्ट सुनाने का, माने बच्चा का मुँह देखाई. एगो अऊर बात बड़ा मजेदार ई रहा है कि आजतक बिना इरसाद बोले हममें से कोनो आदमी सुनाना सुरू नहीं करता है.
बहुत सा पोस्ट को सुनते ही ऊ खुस हो जाते हैं, कोनो कोनो पोस्ट पर उनके आवाज से हमको बुझा जाता है कि बहुत पसंद नहीं हुआ. लेकिन उनके बात का हम अऊर हमरे बात का सम्मान ऊ करते रहे हमेसा.
एगो पोस्ट हम बहुत मन लगा कर लिखे थे. बहुत प्यारा था हमको. पूरा सुनने के बाद ऊ बोले, “बहुत सुन्दर है सर जी! लिखा भी शानदार है! लेकिन इसको पब्लिश मत कीजिये. जिन बातों के कह देने से अपशकुन होने की बात आप कह रहे हैं, उसपर पोस्ट लिखना भी तो कह देने जैसी बात है.”

उनका बात हमको दिल पर लग गया. भले ही ऊ पोस्ट हमको बहुत पसंद था, लेकिन आझो हमरे फोल्डर में पड़ा हुआ है. कुछ बच्चा गंडमूल नछत्तर में भी पैदा हो जाता है बेचारा.

दू दिन पहिले अइसहीं मन नहीं लग रहा था त सोचे कि चलो अपना पुरनका पोस्ट पढकर देखते हैं. एकदम नॉस्टैल्जिक लगा. बिस्वास नहीं हुआ कि बेनामी से सलिल वर्मा अऊर सलिल वर्मा से सलिल जी, सलिल जी से सलिल भाई अऊर सलिल भाई से चाचा, दादा, बाउजी, दाऊ, दादू, पापा अऊर पा. कभी सोचबे नहीं किये थे कि बात बात में बात एतना बढ़ जाएगा.

आज हमरे ब्लॉग का भी तीन साल हो गया.
हमरे सुरुआती टाइम का दू चार ठो कमेन्ट आपके साथ बांटना चाहते हैं. लोग का सोचते थे हमरे बारे में अऊर अब का दर्जा है हमारा उनके दिल में.

कुमार राधारमण:
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है। मेरा शुरू से मानना रहा है कि ब्लॉग पर जितना सार्थक काम हो रहा है,उसमे से कम से कम पचास प्रतिशत का श्रेय छद्मनामी या अनामी ब्लॉगरों को जाता है। ठेठ भाषा की शैली में नाममात्र ब्लॉग लिखे जा रहे हैं। मुझे विश्वास है कि अगर आप ब्लॉग जगत में बने रहे,तो एक दिन आपका योगदान सार्वजनिक चर्चा का विषय बनेगा। शुभकामनाएं लीजिए।

शिवम मिश्रा:
मेरे हिसाब से बात यह जरूरी है की आप अपने ब्लॉग के मार्फ़त क्या कहेते है ना कि यह कि आप कौन है और कहाँ के है ??

मैं आपके ब्लॉग से जुड़ा क्योंकि आपकी बातो में मुझे अपनेपन का अहेसास हुआ और आपकी बाते दमदार लगी !! जिस किसी भी दिन यह दोनों खूबियाँ आप में नहीं होगी आप आप नहीं होगे और हम आपके साथ नहीं होगे !! वैसे बिहार का होने में कोई गुनाह नहीं है आप अपनी भाषा को और अपने आप को जो सम्मान दिलाने की कोशिश कर रहे है वह तारीफ के काबिल है !!

हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है !!


संजय अनेजा- मो सम् कौन:
ई लेयो भाई, पहला कमेंट हमरा झेलो।
अपनी पोस्ट पर कमेंट और अपने प्रदेश पर होने वाली कमेंट की बात करके आपने अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। 
फ़िर से कहता हूं, जब तक आप किसी की मानहानि नहीं कर रहे हैं, बेनामी होने के कारण या किसी प्रांत विशेष से संबंध रखने के कारण होने वाले भेदभाव के विरोध में हम भी आपके साथ हैं।


सतीश सक्सेना:
मेरा विचार है कि किसी लेखक के व्यक्तित्व को जानने के लिए आप उसके ३ - ४ लेख पढ़ लीजिये ! मेरा विश्वास है कि उसका सच्चा व्यवहार समझने में देर नहीं लगेगी ! आपकी पहली पोस्ट से आप एक भले मगर मज़बूत आदमी लगे ! प्रांतीयतावाद और भेदभाव इस देश से हर हालत में मिटना चाहिए ! इसके लिए लेख के माध्यम से आवाज उठाना मानवता और देश की सेवा ही है !
 
एक बात और कृपया गुरु जी न कहें ...मैं अपने आपको इस सम्मान के योग्य नहीं मानता ...हो सके तो दोस्त और भैया कहो उसमे बड़ा प्यार है!


नीरज गोस्वामी:
आज आपका ब्लॉग पे पहली बार आना हुआ और पहली बार में ही यहाँ का हो कर रह गया..आपक लिखने का अंदाज़ इतना रोचक है के एक के बाद एक कई पोस्ट पढ़ गया...दू जून का बात में आप गज़ब ही कर दिए हैं...अब आपका समझो मैं पक्का फैन हो गया हूँ...कोई रोक सके तो रोक ले...:))

स्व. डॉक्टर अमर कुमार:
মা গো.. কি রকম ভাল কথা.. (ओ माँ, कितनी सुन्दर बात)
কিন্তু একটু অব্যেক্শন তো..  (किन्तु एक ओब्जेक्शन है)
এঈটা কোলকাতার ও বাঁগালের কর্জ নেঈ (यह कोलकाता और बंगाल का क़र्ज़ नहीं)
আবার দিন দুঈগুলোর প্রতিদান বলবেন (इसके बाद दोनों को प्रतिदान बोलिएगा)

मनोज कुमार:
धुत्त मरदे!
इतना अपनापन से कोई लिखता है। आप त बात-बात में रुलाइए देते हैं। ई सब बात मने में रखते त काम नहीं चलता का।
अब छोटका भाई बना लिए हैं त आना त पड़ेगा ही। इधर बहुत दीन से दील्ली जाना हुआ ही नहीं है। ससुरारो बाला सब इयाद नहीं करता है। देखें "ऊ" अगर राखी बांधने का जीद की त जाना तो होगा ही।
हं एगो बात है। परिबार बढाते रहिए। इसमें नियोजन का कोनो जरूरत नहीं है।

सरिता दी:
aaj mai London pahuch gayee bitiya ke paas mere blog se mere bacche jude hai kahee bhee ho padte hai aur personally phone par batate hai apanee pratikriya.........

aapkee tippanee padkar aapkee shailee bahut acchee lagee. ( S F O se phone par bolee badee betee ) mamma uncle apane lagte hai...........
ise blog jagat se parivar jan saa sukh milta hai.....comments kee gintee mai nahee kartee par haa apanapan jaroor toul letee hoo .
bitiya ne yanhaa aate hee sabse pahile mera laptop activate kar diya.......

अब का कहें.. बहुत कुछ बिखरा सा है. बहुत सा रिस्ता समेट लिए. हाँ, सरिता दी का एक्के बात दिमाग में हमेसा रहा कि कमेंट्स का गिनती कभी नहीं किये, हाँ अपनापन जरूर तौल लेते रहे.

कहानी, कबिता, नज़्म, संस्मरण, समीक्षा सब लिखे. सम्मान और अवार्ड के नाम पर रिस्ता बनाते रहे. कभी गायब रहे तो महीनों नजर नहीं आये, मगर हालचाल सबका पता लगाते रहे! अपनापन भी कोनो चीज है भाई. अऊर एही त पहचान है हमारा!!

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

किसन अर्जुन

अभी कल्हे-परसो टीवी पर देख रहे थे प्रोग्राम “मूभर्स एंड सेखर”... अरे ओही अपना सेखर सुमन का प्रोग्राम. एगो पाकिस्तानी हिरोइन को बोलाए हुए था, जिसके बारे में बहुत सा खिस्सा पहिलहीं से मशहूर है, नाम बीना मलिक. जब ऊ बोलने लगी त बताईं कि भारत में उनका बहुत सा लोग के साथ प्रेम सम्बन्ध बना अऊर सबके साथ ब्रेकप हो गया. अब ई ब्रेकप का माने होता है मन भर जाना, चाहे भिखमंगा के जैसा दोसरा दरवाजा देखना. हमको संतोस हुआ कि इसमें दिल टूटने जैसा कोनो बात नहीं है. बस भेकेंसी हो जाने वाला बात है कि अब जगह खाली है. बीना मलिक खुदे बोलीं कि अब हमको कोई सच्चा दोस्त का तलास है.

सिनेमा का दुनिया में ई सब टाइप का खिस्सा पहले बनाया जाता है, फिर उसको फैलाया जाता है अऊर बाद में उससे इनकार कर दिया जाता है, चाहे अफवाह बता दिया जाता है.  ऊ एगो कहावत है न कि लक्ष्य पा लेने के बाद त कोनो आनंद नहीं है, असली आनंद त जात्रा में है. आमिर खान जब अपना बीवी को छोडकर दोसरा औरत से बिआह (?) कर लिए त बात खतम हो गया, करीना कपूर जब होटल में साहिद कपूर के साथ धरा गयी थीं, त बड़ी हंगामा हुआ, मगर जब साहिद कपूर को छोड़ दी त कोनो बात नहीं, सैफ अली, जब सादी के इतना साल बाद, अमृता सिंह को छोड़ दिए त बबाल मच गया, मगर जब करीना के साथ खुल्ले आम घूमने लगे त बात खतम. अब ऊ बिआह करें कि साले-साल बिआह पोस्टपोन करें, कोनो आदमी के पेट में दरद नहीं होता है. जब तक ऊ लोग ई खबर को अफवाह बताता रहा, लोग मजा लिया; जिस दिन कन्फर्म हो गया, बात खतम.

देवयानी चौबल उर्फ देवी (खाली ‘उर्फ’ लगा देने से खूंखारियत चौगुना हो जाता है) अइसने एगो पत्रकार थीं – गॉसिप पत्रकार. जब हम लोग इस्कूल/कॉलेज में पढते थे, तब सोचते थे कि कहाँ-कहाँ का खबर निकालकर लाती है. अभी हाल में जब “द डर्टी पिक्चर” देखे, त अंजू महेन्द्रू (इनका गैरी सोबर्स के साथ, बाद में राजेस खन्ना के साथ खूब कहानी चला था) को देवयानी चौबल के रूप में देखकर पुराना टाइम याद आ गया. भगवान उनके आत्मा को सांति दे, मगर कमाल की गॉसिप पत्रकार थी. बताता है लोग कि राजेस खन्ना को ऊपर चढाने में देवी का बड़ा हाथ था.

जाने दीजिए, सिनेमा का दुनिया त आभासी दुनिया से भी जादा आभासी है. ब्लॉग का आभासी दुनिया भी गॉसिप से अछूता नहीं है. आज ओही बताने के लिए हम इतना बात बताए हैं. हमरा ब्लॉग पढ़ने वाला में बहुत सा लोग अइसा भी है जो लोग सामाजिक/व्यावसायिक दुनिया से हमसे जुड़ा है. ऊ लोग कमेन्ट नहीं करता है, मगर ब्लॉग पढता है जरूर. ई बात इसलिए कहे कि ऊ लोग का नाम बताने से भी आपलोग नहीं पहिचान पायेंगे. ऊ लोग से गाहे-बगाहे भेंट होता रहता है. कुछ रोज पहिले एगो फंक्सन में हम गए. बिस्वास कीजिये, जेतना लोग हमसे मिला, सब लोग एक्के बात पूछ रहा था. तनी आप भी सुनिए बातचीत:
“क्या बात है सलिल भाई! चैतन्य जी से कोई झगड़ा हुआ है क्या?”
“नहीं तो!!! आपसे किसने कहा?”
“छोडिये, जाने दीजिए! हम भी खबर रखते हैं!” मुस्कुराते हुए अइसे बोले जैसे एजेण्ड बिनोद हों.
“अच्छा! ज़रा मुझे भी बताइये, क्या खबर है हमारे बारे में?”
“यही कि आप लोगों में लिखने को लेकर झगड़ा हो गया है. वैसे एक बात बताऊँ सलिल जी, मैं शुरू से जानता था कि ये ज़्यादा दिन तक नहीं चलने वाला था. इगो क्लैश, यू नो!”
“मित्रवर! इगो का परित्याग करके ही हम दोनों एक हुए थे. फिर हमारे मध्य इगो की दीवार कहाँ से आयी!”
“हा हा हा! अब तो आप ये कहेंगे ही! खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे. प्लीज़ बुरा मत मानियेगा!”
“बुरा तो हमें किसी बात का नहीं लगता, मगर आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे आपने घोड़े के मुँह से ही सुन रखा हो ये सब. चैतन्य जी ने आपको फोन किया था या आप चंडीगढ गए हुए थे उनके पास?”
“अरे हम तो मजमून भांप लेते हैं लिफाफा देखकर!” (फिर से एजेंट विनोद) “चलिए मान लिया आपकी बात सच है, तो फिर ‘संवेदना के स्वर’ पर कुछ भी नया क्यों लिखा आप लोगों ने? बताइये-बताइये! जबकि ‘चला बिहारी..’ पर आप लगातार लिख रहे हैं!”

त ई बात है!!! हम चुप रहे, हम हंस दिए... अब ऊ लोग को हम का बताएं कि सायदे कोनो दिन अइसा होता होगा जब चैतन्य आलोक अऊर हम नहीं बतियाते होंगे, बल्कि दिन भर में बीस बार. कोनो मुद्दा ऑफिसियल या अन्-ऑफिसियल, हम दुनो सेयर करते हैं, बहस करते हैं और सलाह-मसबिरा करते हैं. हम दुनो को अफ़सोस है कि उनके साथ काम का बोझ एतना आ गया है अऊर ऑफिस का माहौल इतना अजीब हो गया है कि पहिले जेतना टाइम भी नहीं है अऊर टेंसन भी बहुत है! हमरा भी ओही हाल है, मगर हम उनके बिना ‘संवेदना के स्वर’ का कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. इहाँ तक कि ई ब्लॉग पर भी कोनो पोस्ट अइसा नहीं है, जो उनको बिना सुनाये हुए हम पोस्ट किये हों. एही नहीं, ब्लॉग जगत का कोनो गतिबिधि उनसे छूटा हुआ नहीं है. ऊ ब्लॉग जगत से दूर हैं, मगर सब खबर पूछते रहते हैं हम से.

आज हमरे ब्लॉग का दोसरा सालगिरह है. मगर ई दू साल के सफर में हम दू आदमी को कभी नहीं भुला सकते हैं. एगो हैं मनोज भारती... हमेसा हमको लिखने के लिए प्रेरित करते रहे. हमारा पोस्ट जेतना मन लगाकर ई पढते हैं, बहुत कम लोग पढता होगा. सच पूछिए त जेतना सीरियसली हम लिखते नहीं हैं, ओतना सीरियसली मनोज भारती जी पढते हैं हमारा पोस्ट.

अऊर चैतन्य बाबू का त बाते अलग है. मनोज जी अगर प्रेरना हैं त चैतन्य जी आत्मा हैं. आज अगर हम ब्लॉग जगत में दू साल पूरा कर रहे हैं त उस जात्रा में एक कदम हमरा है अऊर दोसरा कदम चैतन्य जी का. बहुत दिन हो गया उनसे मिले हुए. एक दिन फोन किये कि बस आपके साथ आमने-सामने बैठकर बात करने का मन कर रहा है. हम भी सोचे कि पता नहीं कब हमरे ट्रांसफर का चिट्ठी आ जाए अऊर हम उनसे एतना दूर हो जाएँ कि आसानी से मिलना भी नहीं हो पाए. हम भी बोले कि बस आपको छूकर देखना चाहते हैं. आज पता नहीं कहाँ से पाओलो कोएल्हो का कहा हुआ एगो संबाद याद आ रहा है:

मैंने गौर से कारवाँ को रेगिस्तान पार करते देखा. इन दोनों की भाषा एक ही है. इसीलिए रेगिस्तान कारवाँ को अपने ऊपर से गुजरने देता है. वह कारवाँ के हर कदम को बड़े ध्यान से देखता-परखता है कि वह समय के साथ है कि नहीं. यदि है, तो फिर वह हमें नखलिस्तान पहुँचाने से नहीं रोकता!

सचमुच ऊ नखलिस्तान हमरे सामने है, हम दुनो ‘सखा’ के साथ-साथ चलने का नतीजा, हमरे ब्लॉग का दूसरा सालगिरह!


रविवार, 12 फ़रवरी 2012

और इक साल गया!!


आज एगो बहुत पुराना खिस्सा याद आ गया. गर्मी के दुपहरिया में एगो पेड़ के नीचे तीन आदमी थक कर आराम कर रहा था. पहिला मौलवी, दोसरा पंडित अऊर तीसरा कोनो दुकानदार था. ओही पेड़ पर एगो चिड़िया भी सुस्ता रही थी. अचानक चिड़िया बोली टिर्र, टिर्र, टिर्रक. आग जइसा गर्मी में चिड़िया का बोली का मिठास सुनकर तीनों आदमी परसन्न हो गया. सबसे पहिले मौलवी साहब बोले, “देखो परिंदा कह रहा है, खुदा की कुदरत!”
पंडित जी टोक दिए, “क्या बात करते हैं आप, ये कह रहा है राम, लक्षमन, भरत!”
दोकानदार बोला कि चिड़िया को धरम-करम से का मतलब ऊ त बोल रहा है “नून, तेल, अदरख!”
खिस्सा खतम. बड़ा होने पर ई कहानी से हमको एही समझ में आया कि आदमी आपना पेसा के हिसाब से सब चीज को देखता है. याद है न आपको फिलिम मुन्नाभाई, एम्.बी.बी.एस. में डॉक्टर अस्थाना पेसेंट को सब्जेक्ट बोलता था, जबकि मुन्नाभाई कहता था कि ऊ आनंद बैनर्जी है, सब्जेक्ट नहीं.

एगो कागज़ पर अंगरेजी का अच्छर AC लिखकर हमको देखाइयेगा, त हम कहेंगे कि इसका मतलब होता है अकाउंट, बैंकर हैं ना. मगर कोनो दोसरा आदमी बोलेगा कि इसका मतलब होता है एयर कंडीसन. “मेमोरी” सब्द का माने, कंप्यूटर वाला के लिए और मनोवैज्ञानिक के लिए अलग-अलग होता है.

एगो नौजबान इस्मार्ट ब्लॉगर, एक रोज अपना प्रेमिका से मिलने गया, त ऊ बहुत दुलार से सिकायत करते हुए बोली, “हमारा त गली में निकलना मोसकिल हो गया है. लड़का लोग बहुत कमेन्ट करता है!” ई बात बताते हुए उसका ओठ पर मुस्कान साफ़ देखाई दे रहा था. मगर ऊ ब्लॉगर साहब चौंक कर बोले, “कमाल है! दिन भर में कितने कमेन्ट मिल जाते हैं तुम्हें?”
लड़की लजा गयी अऊर बोली, “कभी-कभी त बहुत गंदा कमेन्ट भी करता है सब!”
“पागल हो तुम भी! मॉडरेशन क्यों नहीं लगाती!”
ई जवाब सुनने के बाद लड़की का ज्ञान-चक्छू खुला अऊर उसको समझ में आया कि ऊ कार का बात कर रही थी और ब्लॉगर प्रेमी बेकार का बात किये जा रहा था.
(आचार्य परशुराम राय जी के आग्रह पर)

अब देखिये न, पीछे हम बेंगलुरु वाला पोस्ट पर अपना, उत्साही जी अऊर करण बाबू का फोटो लगाए थे. सबलोग ऊ फोटो देखा अऊर बहुत प्यारा-प्यारा बात भी लिखा. मगर डॉ. कौशलेन्द्र जी का नजर कहीं अऊर था. हमरे फोटो के बारे में उनका मेल हमको आया:
सलिल भैया जी नमस्कार ! 
बेंगलुरु प्रवास में उत्साही जी के साथ खीचे गए आपके चित्र का अवलोकन किया. मेरी चिकित्सकीय दृष्टि को आपके स्वास्थ्य में कुछ गड़बडी दिखाई दी....आप पहले भी कुछ अस्वस्थ्य थे? क्या बात है? कहीं लम्बे समय तक कोर्टीज़ोन तो नहीं लिया था? 
मेल में डॉक्टर साहब का मोबाइल नंबर भी था. उनसे बतियाए अऊर बताए कि आपका नजर सचमुच पारखी है. हमरा आँख देखकर यही बात हमारा डॉक्टर भी हमको बोला था. मगर सर्दी अऊर अनिद्रा के कारन आपको अईसा लगा है. रहा बात कोर्टिज़ोन का, त हमको जब टेनिस एल्बो का जबरदस्त समस्या हुआ था, तब डॉक्टर कहा था इंजेक्ट करने के लिए, मगर हम मना कर दिए. हमरे पिताजी का इसी के मारे बहुत बुरा हाल हुआ था. हम त परहेज से कंट्रोल में किये है. मगर जब दू गो डॉक्टर, एक्के बात कहा है, त एक बार जांच करवा लेते हैं. का मालूम मामला सच्चो सीरियस हो!

डॉक्टर कौशलेन्द्र जी के इस मेल से पहिला बात त ई किलियर हो गया कि हमरा चिंता करने वाला लोग ई आभासी दुनिया में भी है. दोसरा बात कि हमको अब अपना उमर के साथ-साथ अपना स्वास्थ के बारे में भी चिंता करना चाहिए. आखिर मेडिकल साइंस भी कोनो चीज है दुनिया में. खाली दुआ से त काम नहींए चलता है.

हम आजतक एही मानते आए हैं कि हमरे साथ, हमरी माता जी का आसीरबाद अऊर आप सब दोस्त लोग का सुभकामना भी है. अईसे में कोनो रोग-बलाए हमरा का बिगाड़ सकता है. मगर अब समय है चेत जाने का, उमर के साथ. डॉक्टर साहब! जांच करवाकर, रिपोर्ट के साथ आपसे बात करते हैं.
मगर आप लोग कहाँ जा रहे हैं. खेला अभी खतम नहीं हुआ है. आज त हमको आप सब लोग का दुआ, आसिरबाद अऊर सुभकामना का सबसे अधिक जरूरत है. अरे, आज हमरा जनम-दिन है भाई!

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

एक अनमोल तोहफा

पहली बार जब आई थी वो गोद में मेरी
मुझको लगा
भगवान का ये भी होगा कोई मज़ाक
जो मुझसे अक्सर वो करता रहता है.
यकीं नहीं था,
‘उसपर’ भी
और किस्मत पर अपनी
जिसमें थे
छेद न जाने कितने
जिनको सिलने की कोशिश भी मैंने
शायद की हो.

छूकर देखा,
खुलती और झपकती पलकों को भी देखा
गालों और गुलाबी होठों को महसूस किया मैंने
और रोते रोते मुँह बिचकाते उसको देखा.
गोद में लेते डरता था
पर लेकर देखा,
तब जाकर महसूस हुआ कि वो सब सच था.

इंतज़ार कितना लम्बा था पूछे कोई.
बरसों की तो बात ही क्या थी
जन्मों जैसा लगता था हर एक बरस
जब देखता था सूनी सी गोद
उस औरत की
और पूछता था
उस आसमान पे रहने वाले
भगवन से
क्या दोष है उसका.

जब माँगा तब नहीं दिया उसने
और पाया तब,
जब छोड़ दिया था उससे भीख मांगना.
चौदह साल गुज़रने के भी बाद
वो दिन है आज भी ताज़ा ज़हन में मेरे

आज याद तो और भी आता है वो मुझको
आज मेरी झूमा बिटिया की सालगिरह है!!