रामलाल के रिटायर होने
के बाद, उसके सामने दो सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी थी, सिर पर एक मुकम्मल छत और बेटी का
ब्याह. रिटायरमेण्ट के पैसों से वो सिर पर पक्की छत का तो इंतज़ाम कर सका, ताकि
इज़्ज़त से मकान में नहीं घर में रह सके. लेकिन ईमानदारी की नौकरी में उसने कोई
जमा-पूँजी नहीं इकट्ठा की इसलिए रजनी की शादी की उसे बड़ी चिंता रहती थी. कहने को
तो वो बड़े फ़ख्र से कहता था कि उसकी असली जमा पूँजी तो उसकी औलाद हैं, बेटा रमेश और
बेटी रजनी. उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाकर इस क़ाबिल बना दिया है कि वे अपने पैरों पर
खड़े हो सकें.
रमेश अच्छी नौकरी पर
लग गया और उसने पिछले साल दिल्ली में अपने साथ काम करने वाली एक लड़की से शादी कर
ली. लड़की वाले जल्दी शादी करने पर इतना ज़ोर दे रहे थे कि समय कम होने के कारण रामलाल
और रजनी शादी में शामिल नहीं हो पाए. हालाँकि शादी के महीने भर बाद वो अपनी पत्नी
को उनसे मिलवाने ले गया. बहू की जमकर आवभगत हुई और फिर एक सप्ताह के बाद दोनों काम
पर लौट गए. हर हफ्ते नियम से फ़ोन करते हैं दोनों.
रामलाल जब भी कभी
रजनी की शादी की बात रमेश से करता है तो वो अपनी मजबूरी बता देता है कि नई नौकरी
है, समय की कमी है, दिल्ली में उसकी बिरादरी के लड़के कहाँ मिलते हैं. घुमाफिराकर रामलाल
को उसने यह भी कह दिया कि अब आप रिटायर हो चुके हैं तो बिरादरी में ढूँढिए, परिवार
में देखिए, रिश्तेदारों को कहिए... ज़रूर अच्छा रिश्ता मिल जाएगा साथ यह भी जता
दिया था कि उसने अभी नया घर बसाया है इसलिए पैसों की तंगी लगी रहती है.
रजनी पढ़ी लिखी लड़की
थी, नौकरी की तैयारी भी कर रही थी. यह भी समझती थी वो कि उसका भाई उसके लिए कोई
रिश्ता नहीं ढूँढेगा और बूढे बाप के लिए इधर उधर भटकना मुश्किल था. उसे किसी से
प्यार भी तो नहीं था कि लव मैरिज का ही सन्योग बन जाता. उसकी शिक्षा और आत्मसम्मान
ने उसके चरित्र को इतना मज़बूत तो बना ही दिया था कि वो किसी पर डोरे डालने जैसे
स्तर तक भी नहीं जा सकती थी.
एक दिन रजनी की
पक्की सहेली ने किसी से उसका परिचय करवाया. उसका व्यवहार बिल्कुल खुली किताब की तरह था. एक खुली खिड़की की तरह कोई भी उसके
अन्दर झाँक सकता था. उसमें कोई भी ऐसा ऐब रजनी को नहीं दिखा, जिससे वो उससे दूर हो
सके. उसने रामलाल को भी उससे मिलवाया. बूढ़ा
बाप... उसे तो यूँ लगा मानो उसका रमेश उसे मिल गया हो.
जल्दी ही उसने रजनी
के लिये बिरादरी के अन्दर कुछ रिश्ते सुझाए. उनमें
से कुछ वाहियात लोग निकले, कुछ लड़के लोफर निकले.. लेकिन वो तो पता चल ही जाता है. शादी
कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं. फिर भी रजनी ने उसपर भरोसा नहीं खोया. रामलाल को भी बस उसपर ही भरोसा था. उसने रजनी से कहा कि वो बस अपने शहर या
उसके आस-पास ही रिश्ता चाहती है ताकि बाबा को जब चाहे आकर देख ले, मिल ले. अगर वो
कहे तो किसी और शहर में भी अच्छे लड़के मिल सकते हैं. रजनी ने बाबा से बात की और
बनारस या उसके पास लड़का देखने की बात बताई. सोचा बनारस में रजनी की बुआ रहती हैं,
इसलिए लड़के के घर-परिवार का पता लगाने में सहूलियत रहेगी.
इसे संजोग कहें या
रजनी की किस्मत. उसने तीन-चार रिश्ते बनारस, लखनऊ के बताए. बनारस के एक परिवार में
बात आगे बढ़ी और उन्होंने साफ कह दिया कि उन्हें बस लड़की के गुण और व्यवहार की
गारण्टी चाहिए, वे बिना दहेज शादी करने को तैयार हैं. रजनी की बुआ ने बताया कि उस
परिवार में उनके ससुराल की रिश्तेदारी है. लड़का बड़ा सुशील है, कोई ऐब नहीं, अच्छी
नौकरी है और रमेश से अच्छा कमाता है.
अगले ही हफ्ते रजनी
रामलाल के साथ बनारस अपनी बुआ के पास चली गई. लड़के वालों को लड़की बहुत पसन्द आई. उन्होंने
रजनी के पढ़ने या नौकरी करने से कोई ऐतराज़ नहीं जताया. शादी पक्की और सगाई की तारीख
हफ्ते भर बाद की तय हो गई. बैंक से पैसे निकालकर, जल्दी-जल्दी रामलाल ने सारी
तैयारियाँ की.
आज रजनी की सगाई है
और वो जितना खुश अपनी सगाई से नहीं है, उससे ज़्यादा खुशी उसे इस बात की है कि उसके
बाबा खुश हैं. रमेश भैया को ख़बर कर दी गई, लेकिन उसके पास कोई ज़रूरी प्रोजेक्ट था
इसलिए वो नहीं आ सका. हाँ उसने ये वादा किया कि वो शादी पर ज़रूर आएगा भाभी के साथ.
इस खुशी और जश्न के
माहौल में वो उसे कैसे भूल सकती थी, जिसकी वज़ह से ये खुशियाँ उसके जीवन में आई
थीं. उसे इतना अच्छा रिश्ता मिला. उसने वो किया जो उसका सगा बड़ा भाई भी नहीं कर
पाया. ख़ैर ये समय कड़वाहट का नहीं. उसने सोचा कि अपने इस "अनोखे भाई" को एकबार
धन्यवाद तो कह दे.
उसने लैपटॉप ऑन किया और
टाइप किया डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू. जोडियाँस्वर्गमेंबनतीहैं.कॉम. साइट के खुलते ही उसने
मुस्कुराकर कहा – मेरे भैया! तुम्हें शुक्रिया कहते हुए शर्म आ रही है! तुम्हारी
वज़ह से आज ये दिन नसीब हुआ है. लव यू भैया!!
