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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

खेल खेल में!

किरकेट का वर्ल्ड कप जीतने के बाद पूरा देस में किरकेट का हवा बह रहा है. फाइनल वाले रोज, हम पटना से चल दिए थे दिल्ली के लिए अऊर गाडी में बईठकर अपने मोबाइल पर मैच का मजा ले रहे थे. बाकी कसर चंडीगढ़ से चैतन्य जी अऊर दिल्ली से हमारी सुपुत्री पूरा कर रही थी. किरकेट का नसा हइयो है अजीब. जब भारत जीता तब हमारा गाडी इलाहबाद से पाहिले जमुना जी के पुल पर से गुजर रहा था. जैसहीं धोनी का छक्का लगा अऊर भारत जीता, पूरा गाडी में इतना जोर का हल्ला हुआ कि पूछिये मत. हमको बुझाया कि केतना सुतल आदमी डरे गिर गया होगा अपना बर्थ पर से. हमरा गाडी जमुना पार करके दारागंज इलाका से गुजर रहा था. देखकर लगा कि कोनो त्यौहार मनाया जा रहा है. सच्चो कहता है लोग कि आज देस में किरकेट धर्म बन गया है. फेसबुक पर भी ओही हंगामा था. मोबाइल से जेतना लिख सकते थे लिखे.

किरकेट का खेल के बारे में ई कहना कि हम दीवाना हैं ई खेल के, ओइसहीं है जईसे कहना कि लता मंगेशकर का आवाज़ बहुत मधुर है, सचिन बहुत अच्छा किरकेटर है, धोनी बेजोड़ कप्तान है, महाभारत कालजयी महाकाब्य है, अमिताभ बच्चन के आवाज में जादू है अऊर सेक्सपियर बहुत बड़ा नाटककार थे. मगर ई सच है कि खेल से दूर रहने के बावजूद भी किरकेट हम खेलते, देखते अऊर समझते थे. पिताजी फुटबाल के सौखीन थे अऊर ओही गुण उनकी पोती में समाया है. आर्सेनल का मैच देखते देखते इतना पगला जाती है कि लगता है कि टीवी में घुसकर खेलने लगेगी. देर रात अकेले मैच देखते हुए जोर जोर से चिल्लाते हुए गलती पर गुस्साती है. गुरुदेव के. पी. सक्सेना के इस्टाईल में हम बोल भी देते हैं कि टीवी के पीछे जाकर कान में काहे नहीं बोलती हो फाबरेगास को कि ठीक से गोल करे. हमको तो बुझाता है कि हमरे स्वर्गीय पिताजी का आत्मा उसके अन्दर परवेस कर गया है फुटबाल के मामला में.

खैर, खेल से तनी परहेज रहा है हमको. मगर खेल में केतना मौक़ा ऐसा आया है जो हमरे दिमाग में आज भी फोटो का जइसा बस गया है. १५ मार्च १९७५ का दिन था. मैट्रिक का आखरी पर्चा था हमारा, सब्जेक्ट याद नहीं. पिताजी इम्तिहान दिलवाने ले जाते थे अऊर दिन भर इस्कूल के मैदान में बैठकर किताब पढ़ते रहते थे, ट्रांजिस्टर पर गाना सुनते अऊर बाकी लोग से बातचीत करते रहते थे. उस दिन ऊ कमेंट्री सुन रहे थे. हम इम्तिहान देकर निकले तो असोक राजपथ पर टी.के. घोष एकेडेमी से पैदल चल दिए. पिताजी कान से ट्रांजिस्टर सटाए हुए कमेंटरी सुन रहे थे. कुआलालम्पुर में हॉकी का बिस्व कप फाइनल मैच चल रहा था, भारत अऊर पाकिस्तान के बीच. घमासान मचा हुआ था. अऊर जब हमलोग एलिफिसटन सिनेमा के पास पहुंचे, तो भारत पाकिस्तान को २-१ से हराकर विश्वविजयी बन गया. आझो तक अजित पाल सिंह, असोक कुमार, सुरजीत सिंह, असलम सेर खान, फिलिप्स का नाम याद है हमको. पिताजी के चेहरा पर जो खुसी हम देखे ऊ आज भी हमको याद है. मगर अफ़सोस एही बात का है कि उसके बाद भारत अऊर पाकिस्तान हॉकी के दुनिया से धीरे धीरे गायब हो गए.

एगो पत्रिका आता था “स्पोर्ट्सवीक”. इसलिए भी पसंद था कि इसका बिग्यापन हमरे हीरो फारुक इंजीनियर करते थे रेडियो पर. "एंड द बॉल इज ब्रिलियंटली हिट बाय फारुक इंजिनियर.' अऊर तब उनका आवाज आता था. 'वेल! आय एम् फारुख इंजिनियर. आय रीड स्पोर्ट्सवीक. डु यू?" जेतना हम उनके स्मार्टनेस के दीवाने थे, ओतने उनके खेल अऊर विकेट कीपिंग के. बस आने लगा घर पर स्पोर्ट्सवीक. अऊर हमरा परिचय हुआ खेल के दुनिया से. ओही साल विम्बलडन टूर्नामेंट में भी दिलचस्पी सुरू हुआ. १९७५ में आर्थर ऐश पुरुषों के अऊर बिली-जीन किंग महिलाओं के सिंगल्स की चैम्पियन बनी. जैसे वर्ल्ड कप हॉकी जीतने के बाद मैदान पर बेहोश होकर गिरने वाले वी. जे. फिलिप्स का फोटो हमारे दिमाग में बसा है, ओइसहीं आर्थर ऐश अऊर बिली-जीन किंग का ट्रॉफी लिए हुए फोटो आज भी याद है.

कलकत्ता में हमारे ऑफिस के बगल में टेनिस का मशहूर “साउथ क्लब” था. रईस लोग का खेल कहा जाने वाला टेनिस खेलने के लिए प्रैक्टिस करने रोज हम बहुत सा साधारण घर का बच्चा लोग को देखते थे. एही मैदान पर प्रेमजीत लाल , जोयदीप मुकर्जी, रामनाथन कृष्णन, अमृतराज बन्धु, लेंडर पेस, महेश भूपति खेलते रहे अऊर केतना डेविस कप का टूर्नामेंट आयोजित हुआ. टेनिस खेलने वाला हर बच्चा एही सपना लिए खेलता कि एक दिन ऊ भी विजय अमृतराज या लेंडर पेस बनेगा. भगवान ऊ सपना पूरा करे.

आज भी जहां नोएडा में हम रहते हैं, हमारे घर के पीछे क्लब में लोग को टेनिस खेलते हुए देखते हैं. लेकिन कभी हाथ आजमाने का मौक़ा नहीं मिला. मगर पिछ्ला एक महीना से टेनिस ऐसा लगा है हमरे हाथ से कि जाने का नाम नहीं ले रहा है. डॉक्टर का कहना है कि “टेनिस एल्बो” हो गया है. इस बीमारी से तो हमरा परिचय सचिन के माध्यम से था, अपना सचिन तेंदुलकर. मगर कहाँ ऊ, कहाँ हम. दर्द जब बर्दास्त से बाहर हो जाता है तो हम सोचते हैं कि ई कस्ट हमको काहे दिए भगवान्. अऊर जवाब में आर्थर ऐश याद आते है. जिनको एच.आई.वी. संक्रमित खून दिए जाने के कारण एड्स का बीमारी हो गया था और उनका मौत हो गया. कोई उनसे चिट्ठी लिखकर पूछा कि भगवान् आपको ही इस बीमारी के लिए क्यों चुने तो उनका जवाब था-

"दुनिया में ५० मिलियन बच्चे टेनिस खेलना शुरू करते हैं. उनमें से सिर्फ ५ मिलियन खेलना सीख पाते हैं. केवल ५ लाख प्रोफेशनल टेनिस के स्तर तक पहुँचते हैं और ५० हज़ार सर्किट में आते हैं. ५००० खिलाड़ियों को ग्रैंड स्लैम खेलने ला मौक़ा मिलता है और सिर्फ ५० विम्बलडन तक पहुंचते हैं. आठ क्वार्टर फाइनल, चार सेमी फाइनल और सिर्फ २ फाइनल तक पहुंचते हैं. जब मैंने हाथ में विबल्दन ट्रॉफी उठा राखी थी तब कभी नहीं पूछा कि भगवान सिर्फ मैं ही क्यों!! तो फिर आज इस असहनीय तकलीफ में क्यों पूछूं कि मैं ही क्यों!!”

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

ख़ून का रिश्ता


हम पहिले जऊन ऑफिस में थे, वहाँ ऑफिस खुलता था दस बजे, मगर हमरा काम साढ़े नौ बजे से सुरू हो जाता था. बस एक के बाद एक लगातार टेलीफोन पर टेलीफोन. एगारह बजे से पहिले फुर्सत नहीं. अब जब काम था था. डेढ़ घण्टा के बीच में हमको, हमरा टेबुल पर रखा हुआ इस्टेटमेण्ट अऊर फोन के अलावा, आस पास का कोनो खबर नहीं रहता था. डेढ़ घण्टा के बीच में कोई पीछे से आकर हमको चक्कू भी मार जाए, जब तक काम खतम हो जाए, हमको पता नहीं चलने वाला कि हमरे साथ का हो गया है. अलग बात है कि उसके बाद हम दरद से मरें चाहे नहीं मरें, खून देखकर जरूर मर जाएंगे.
19 जनवरी 2007. कलेंडर के हिसाब से मामूली दिन अऊर ऑफिस के हिसाब से बहुत बिज़ी दिन था. सबेरे साढ़े नौ बजे से फोन पर लगे हुए थे. करीब आधा घण्टा के बाद से हमको लगा कि हमरे आस पास काना फूसी अऊर गहमा गहमी चल रहा है. टाइम नहीं कि माथा उठा कर देखें अऊर पूछें कि का बात है. करीब साढ़े दस बजे जब फ्री हुए हमरे पूछने से पहिले ही सब बताया कि शैलेंद्र नाथ दवे का एक्सीडेण्ट हो गया है, आज ऑफिस आते समय. हम पूछे कि अभी कहाँ है, तब पता चला कि वेलिंग्डन हॉस्पिटल ले गए हैं. शैलेन्द्र नाथ दवे, हमरे बिभाग में सीनियर कर्मचारी थे अऊर यूनियन के नेता भी. मगर हमसे कभी नेता वाला टकराव नहीं हुआ.
हम एगो स्टाफ को साथ लिए अऊर हॉस्पिटल के लिए निकल गए. वहाँ जाकर इमर्जेंसी वार्ड में देखे तो दवे जी बेड पर पड़े हुये थे. साथ में कोई नहीं. ग़ाज़ियाबाद से आते थे और घर पर बुजुर्ग पिताजी हार्ट के पेसेंट थे, इसलिये उनको बताना मोस्किल था. एक अऊर आदमी जो उनके साथ आते जाते थे, दुर्घटना के समय भी उन्हीं के साथ थे. हमको देखते दवे जी हमरा हाथ पकड़ लिए अऊर बोले, “मुझे बचा लो सर!हमरे मुँह से कोनो आवाज नहीं निकला.
सबसे पहिले हम दवे जी के साथ जो उनके दोस्त थे अऊर जो उनको हॉस्पिटल लेकर आए थे, उनको धन्यवाद कहे. फिर पूछे कि क्या हुआ था. तब जो बताए उसको सुनकर करेजा काँप गया. दूनो आदमी सड़क पार कर रहे थे. सिगनल लाल था अऊर सड़क खाली. अचानक एगो कार सिगनल तोड़ते हुए आया अऊर दवे जी को धक्का दिया. गिर गए रोड पर अऊर गाड़ी का पहिया उनके गोड़ पर चढ गया. गाड़ी वाला गाड़ी रोका अऊर फिर से गाड़ी को पीछे करके दोबारा गोड़ के ऊपर से बैक करके भाग गया.
फिर पुलिस, ऐम्बुलेंस, गाड़ी का नम्बर, वकील अऊर हॉस्पिटल का इमरजेंसी वार्ड. हम डॉक्टर को पूछे कि क्या करना है, तो बोला कि अभी प्लास्टर करना होगा कच्चा.  मगर ऑपरेसन करके अंदर रॉड लगाना होगा. खैर पहिले तो हॉस्पिटल से छुटकारा पाना था. डॉक्टर प्लास्टर रूम में लेकर गया, साथे हम भी गए.
दवे जी का पैण्ट काटकर गोड़ का नीचे वाला हिस्सा में प्लास्टर करना था अऊर दर्द बर्दास्त से बाहर था उनके लिए. पूरा कपड़ा में लगा हुआ खून देखकर हमरा मन खराब हो रहा था. हमारे जईसा साकाहारी आदमी को एतना खून, भी आदमी का, पहिला बार देखने को मिला था. अपना मन को काबू में किए.
डॉक्टर आकर जईसे गोड़ को हाथ लगाया, दवे जी हमरा हाथ एतना जोर से पकड़ लिए कि हमको दर्द होने लगा. पूरा कमरा में उनका चीख गूँजने लगा, “वर्मा सर! मार डालो मुझे. मैं लंगड़ाते हुए जिंदगी नहीं गुज़ार सकता. बहुत दर्द है, काट दो मेरा पैर!!हम खाली एतने बोल पाए कि धीरज रखो. हम उनका खून से सना हुआ गोड़ पकड़े अऊर डॉक्टर प्लास्टर लगाने लगा. दवे जी लगातार दरद से चिल्लाते जा रहे थे, अऊर ओतने जोर से हमरा मन घबरा रहा था. एतना गाढ़ा लाल खून, दरद भरा चीख अऊर उनके आँख से बहता हुआ आँसू, उनका एकलौता बेटा का खयाल, उनके पिताजी का बीमारी, सब हमरे नजर के सामने घूम गया.प्लास्टर हो गया, नींद का सुई लग गया, उनका भाई गया अऊर सारा दिन हॉस्पिटल में बिताकर जब हम लौटे. तब समझ में आया कि मन केतना खराब था हमरा. खाना नहीं खाया गया हमसे. रह रह कर फैला हुआ खून आँख के सामने घूम रहा था.
हमरे परिवार में हम अऊर हमरा मँझला भाई साकाहारी हैं और हम तो पैदाइसी सकाहारी. हमरे खानदान के बारे में डॉ. हरिवंस राय बच्चन लिखे हैं कि अईसा माँसाहारी खानदान कि लोग पूछता था कि माँ के पेट में रहकर अपना माँ का माँस कईसे नहीं खाया अऊर खुदे जवाब भी देते हैं कि उस समय मुँह में दाँत नहीं था, सायद इसीलिए. अब बताइए अईसा कट्टर माँसाहारी परिवार में कट्टर साकाहारी हम, एतना खून देखना कईसे बर्दास्त किए होंगे. खैर, दवे जी को ले गया लोग गाजियाबाद. ऑपरेसन हुआ, रॉड डाला गया गोड़ के अंदर अऊर करीब चार पाँच महीना के बाद ऑफिस भी गए. आते ही हमको गले लगाए.
दिन अऊर आज का दिन, दूगो परिबर्तन हो गया हमरे जीबन में. पहिला कि हमसे कार चलाना छूट गया. जब स्टीयरिंग पकड़ते लगता कि दवे जी हमरे गाड़ी के नीचे खून में पड़े हुए हैं. अऊर दोसरा परिबर्तन कि दवे जी को उस दिन के बाद दवे जी कहना छोड़ दिए हम. जिस दिन ऑफिस आए हम सबके सामने बोले कि दवे जी के चरन पकड़कर सारा दिन हम बईठे रहे हैं, इसलिए आज से हमरे बड़े भाई हुए. चुँकि गुजराती हैं, इसलिए हम आज से इनको मोटा भाई (बड़ा भाई) कहेंगे.  
आज  तक रिस्ता बना हुआ है, खून का रिस्ता.