किरकेट का वर्ल्ड कप जीतने के बाद पूरा देस में किरकेट का हवा बह रहा है. फाइनल वाले रोज, हम पटना से चल दिए थे दिल्ली के लिए अऊर गाडी में बईठकर अपने मोबाइल पर मैच का मजा ले रहे थे. बाकी कसर चंडीगढ़ से चैतन्य जी अऊर दिल्ली से हमारी सुपुत्री पूरा कर रही थी. किरकेट का नसा हइयो है अजीब. जब भारत जीता तब हमारा गाडी इलाहबाद से पाहिले जमुना जी के पुल पर से गुजर रहा था. जैसहीं धोनी का छक्का लगा अऊर भारत जीता, पूरा गाडी में इतना जोर का हल्ला हुआ कि पूछिये मत. हमको बुझाया कि केतना सुतल आदमी डरे गिर गया होगा अपना बर्थ पर से. हमरा गाडी जमुना पार करके दारागंज इलाका से गुजर रहा था. देखकर लगा कि कोनो त्यौहार मनाया जा रहा है. सच्चो कहता है लोग कि आज देस में किरकेट धर्म बन गया है. फेसबुक पर भी ओही हंगामा था. मोबाइल से जेतना लिख सकते थे लिखे.
किरकेट का खेल के बारे में ई कहना कि हम दीवाना हैं ई खेल के, ओइसहीं है जईसे कहना कि लता मंगेशकर का आवाज़ बहुत मधुर है, सचिन बहुत अच्छा किरकेटर है, धोनी बेजोड़ कप्तान है, महाभारत कालजयी महाकाब्य है, अमिताभ बच्चन के आवाज में जादू है अऊर सेक्सपियर बहुत बड़ा नाटककार थे. मगर ई सच है कि खेल से दूर रहने के बावजूद भी किरकेट हम खेलते, देखते अऊर समझते थे. पिताजी फुटबाल के सौखीन थे अऊर ओही गुण उनकी पोती में समाया है. आर्सेनल का मैच देखते देखते इतना पगला जाती है कि लगता है कि टीवी में घुसकर खेलने लगेगी. देर रात अकेले मैच देखते हुए जोर जोर से चिल्लाते हुए गलती पर गुस्साती है. गुरुदेव के. पी. सक्सेना के इस्टाईल में हम बोल भी देते हैं कि टीवी के पीछे जाकर कान में काहे नहीं बोलती हो फाबरेगास को कि ठीक से गोल करे. हमको तो बुझाता है कि हमरे स्वर्गीय पिताजी का आत्मा उसके अन्दर परवेस कर गया है फुटबाल के मामला में.
खैर, खेल से तनी परहेज रहा है हमको. मगर खेल में केतना मौक़ा ऐसा आया है जो हमरे दिमाग में आज भी फोटो का जइसा बस गया है. १५ मार्च १९७५ का दिन था. मैट्रिक का आखरी पर्चा था हमारा, सब्जेक्ट याद नहीं. पिताजी इम्तिहान दिलवाने ले जाते थे अऊर दिन भर इस्कूल के मैदान में बैठकर किताब पढ़ते रहते थे, ट्रांजिस्टर पर गाना सुनते अऊर बाकी लोग से बातचीत करते रहते थे. उस दिन ऊ कमेंट्री सुन रहे थे. हम इम्तिहान देकर निकले तो असोक राजपथ पर टी.के. घोष एकेडेमी से पैदल चल दिए. पिताजी कान से ट्रांजिस्टर सटाए हुए कमेंटरी सुन रहे थे. कुआलालम्पुर में हॉकी का बिस्व कप फाइनल मैच चल रहा था, भारत अऊर पाकिस्तान के बीच. घमासान मचा हुआ था. अऊर जब हमलोग एलिफिसटन सिनेमा के पास पहुंचे, तो भारत पाकिस्तान को २-१ से हराकर विश्वविजयी बन गया. आझो तक अजित पाल सिंह, असोक कुमार, सुरजीत सिंह, असलम सेर खान, फिलिप्स का नाम याद है हमको. पिताजी के चेहरा पर जो खुसी हम देखे ऊ आज भी हमको याद है. मगर अफ़सोस एही बात का है कि उसके बाद भारत अऊर पाकिस्तान हॉकी के दुनिया से धीरे धीरे गायब हो गए.
एगो पत्रिका आता था “स्पोर्ट्सवीक”. इसलिए भी पसंद था कि इसका बिग्यापन हमरे हीरो फारुक इंजीनियर करते थे रेडियो पर. "एंड द बॉल इज ब्रिलियंटली हिट बाय फारुक इंजिनियर.' अऊर तब उनका आवाज आता था. 'वेल! आय एम् फारुख इंजिनियर. आय रीड स्पोर्ट्सवीक. डु यू?" जेतना हम उनके स्मार्टनेस के दीवाने थे, ओतने उनके खेल अऊर विकेट कीपिंग के. बस आने लगा घर पर स्पोर्ट्सवीक. अऊर हमरा परिचय हुआ खेल के दुनिया से. ओही साल विम्बलडन टूर्नामेंट में भी दिलचस्पी सुरू हुआ. १९७५ में आर्थर ऐश पुरुषों के अऊर बिली-जीन किंग महिलाओं के सिंगल्स की चैम्पियन बनी. जैसे वर्ल्ड कप हॉकी जीतने के बाद मैदान पर बेहोश होकर गिरने वाले वी. जे. फिलिप्स का फोटो हमारे दिमाग में बसा है, ओइसहीं आर्थर ऐश अऊर बिली-जीन किंग का ट्रॉफी लिए हुए फोटो आज भी याद है.
कलकत्ता में हमारे ऑफिस के बगल में टेनिस का मशहूर “साउथ क्लब” था. रईस लोग का खेल कहा जाने वाला टेनिस खेलने के लिए प्रैक्टिस करने रोज हम बहुत सा साधारण घर का बच्चा लोग को देखते थे. एही मैदान पर प्रेमजीत लाल , जोयदीप मुकर्जी, रामनाथन कृष्णन, अमृतराज बन्धु, लेंडर पेस, महेश भूपति खेलते रहे अऊर केतना डेविस कप का टूर्नामेंट आयोजित हुआ. टेनिस खेलने वाला हर बच्चा एही सपना लिए खेलता कि एक दिन ऊ भी विजय अमृतराज या लेंडर पेस बनेगा. भगवान ऊ सपना पूरा करे.
आज भी जहां नोएडा में हम रहते हैं, हमारे घर के पीछे क्लब में लोग को टेनिस खेलते हुए देखते हैं. लेकिन कभी हाथ आजमाने का मौक़ा नहीं मिला. मगर पिछ्ला एक महीना से टेनिस ऐसा लगा है हमरे हाथ से कि जाने का नाम नहीं ले रहा है. डॉक्टर का कहना है कि “टेनिस एल्बो” हो गया है. इस बीमारी से तो हमरा परिचय सचिन के माध्यम से था, अपना सचिन तेंदुलकर. मगर कहाँ ऊ, कहाँ हम. दर्द जब बर्दास्त से बाहर हो जाता है तो हम सोचते हैं कि ई कस्ट हमको काहे दिए भगवान्. अऊर जवाब में आर्थर ऐश याद आते है. जिनको एच.आई.वी. संक्रमित खून दिए जाने के कारण एड्स का बीमारी हो गया था और उनका मौत हो गया. कोई उनसे चिट्ठी लिखकर पूछा कि भगवान् आपको ही इस बीमारी के लिए क्यों चुने तो उनका जवाब था-
"दुनिया में ५० मिलियन बच्चे टेनिस खेलना शुरू करते हैं. उनमें से सिर्फ ५ मिलियन खेलना सीख पाते हैं. केवल ५ लाख प्रोफेशनल टेनिस के स्तर तक पहुँचते हैं और ५० हज़ार सर्किट में आते हैं. ५००० खिलाड़ियों को ग्रैंड स्लैम खेलने ला मौक़ा मिलता है और सिर्फ ५० विम्बलडन तक पहुंचते हैं. आठ क्वार्टर फाइनल, चार सेमी फाइनल और सिर्फ २ फाइनल तक पहुंचते हैं. जब मैंने हाथ में विबल्दन ट्रॉफी उठा राखी थी तब कभी नहीं पूछा कि भगवान सिर्फ मैं ही क्यों!! तो फिर आज इस असहनीय तकलीफ में क्यों पूछूं कि मैं ही क्यों!!”
