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रविवार, 8 अप्रैल 2012

मेरा साया!!


[अली सैयद साहब की यह पोस्ट और उनका प्रोत्साहन जिसने मुझे यह पोस्ट आपसे शेयर करने का हौसला दिया!]

कच्चा घर, सामने दालान अउर पीछे अंगना. अंगना के चारों ओर देवाल. देवाल के पार गली, जिसमें दिन भर लोग-बाग का आवा-जाही लगा रहता था. गली के साथ देवी-स्थान और उसमें बिसाल पीपल का पेड़. गर्मी में हम लोग अंगना में बैठकर बतियाते, खेलते अउर पढाई करते रहते थे. गली से आने-जाने वाला लोग का माथा देखाई देता था अउर जब ऊ आदमी छवि बाबू के घर के पास पहुंच जाता, तब पीछे से ऊ पूरा देखाई देता था. इसका उलटा जब छवि बाबू के घर के तरफ से कोई आता, तो पूरा देखाई देता अउर पास आने पर खाली माथा नजर आता.
एक रोज साम को कोनो आदमी का माथा देखाई दिया अऊर छवि बाबू के घर के पास पहुँचने से पहले का मालूम कैसे सब लोग का ध्यान उधरे चला गया. ऊ आदमी का पीठ देखाई दे रहा था. ऊ आदमी उजला गंजी पहिने हुए था अउर छवि बाबू के घर के पास पहुँचाने से पहिले ही नजर से ओझल हो गया (सायद गायब हो गया). हम लोग घबराए अउर बाद में टेंसन कम करने के लिए मजाक उड़ाने लगे हम लोग. कोई बोला आत्मा होगा, कोई बोला भूत, कोई बोला कि गंजी पहिने था तो जरूर चाचा होगे! अउर हम लोग जोर-जोर से हंसने लगे!!

कुछ साल बाद:
सफ़ेद गंजी वाले आदमी का आना अब बहुत बढ़ गया था. जब भी हम लोग में से कोई भी अंगना में बइठा रहता त ई बात के तरफ जरूर ध्यान देता कि गली से कौन जा रहा है. मगर ऊ दिन आस्चर्ज का बात हुआ. अंगना वाला दरवाजा बाहर के तरफ खुला हुआ था, इसलिए गली से आने-जाने वाला सब आदमी पूरा देखाई दे रहा था. दरवाजा से देखाई देने वाला आदमी, गली से होकर, छवि बाबू के घर से आगे निकल जाता था. ओही घड़ी, सफ़ेद गंजी पहने हुए ऊ आदमी दरवाजा पार किया अउर गली में नहीं पहुंचा. भागकर देखा गया त ऊ नदारद था. पैदल चलकर कोई एतना जल्दी, एतना दूर नहीं निकल सकता था.
हम लोग (इहाँ स्पस्ट कर देते हैं कि हम लोग से हमरा मतलब घर का बच्चा-बड़ा सब लोग से है - जिसको जब ई घटना देखाई दे जाए) धीरे-धीरे ई घटना के आदी हो गए अउर एकदम मामूली घटना हो गया हमलोग के लिए! हाँ, एगो बात बताते चलें कि तब तक हम लोग ऊ आत्मा/भूत/साया/हवा को चाचा जी मान चुके थे.

कुछ और साल बाद:
पुराना घर टूट गया अउर पक्का मकान बन गया. घर के फाटक से ड्राइंग-रूम तक आते समय जमीन पर एगो बड़ा सा पत्थर का स्लैब है. बस्तब में ऊ ढक्कन है. जब कोई आता है त उसके ऊपर गोड़ धरते ही ऊ पत्थर हिल जाता है अऊर खटाक का आवाज होता है. ई आवाज का एतना अभ्यास हो गया है कि केतनो हल्ला में भी सुनाई दे जाता है अऊर हमलोग समझ जाते हैं कि कोई आया है. दरवाजा के तरफ ताकिये, चाहे ड्राइंग रूम के खिडकी से देख लीजिए, पहिला नहीं त दोसरा खिड़की से देखाई दे जाएगा कि कौन आ रहा है.
बताने का जरूरत नहीं है कि एक रोज हम लोग बैठ कर टीवी देख रहे थे अऊर बिना फाटक खुलने का आवाज हुए पत्थर का खटाक सुनाई दिया. सबलोग का नजर खिड़की पर. पहिला खिड़की से सफ़ेद गंजी पहिने कोई निकला, मगर दूसरा खिड़की तक कोई नहीं आया. कोई लौटा भी नहीं, काहे कि दोबारा पत्थर का आवाज नहीं हुआ, न फाटक का. बाहर निकल कर देखे त फाटक तक कोई नहीं. एक बार फिर स्पस्ट करने का समय आ गया है कि कोई बिलाई या कुत्ता (नहीं घुस सकता) के आने से खटाक का आवाज़ नहीं हो सकता.
एक बार भाई का कोनो दोस्त आते समय खिड़की से रूम में झांकते हुए आया. भाई से जब मिला त पूछा कि अभी इहाँ सोफा पर गंजी पहिनकर कौन बैठे हुए थे. लगता है हमारे कारन चले गए! भाई मुस्कुराकर रह गया. बोला, चाचाजी थे!

वर्त्तमान समय:
अब हम भाई-बहन बुजुर्ग कहलाने लगे हैं. हमरा बच्चा लोग बड़ा हो रहा है. माताजी बूढ़ी हो गयी हैं. उजला गंजी अऊर पाजामा पहिने हुए चाचा जी आझो हमलोग को, बच्चा लोग को भी, हमरे दोस्त लोग को भी अऊर बहुत सा मेहमान लोग को भी आते जाते हुए देखाई देते हैं. एक बार सोफा पर बैठा हुआ छोडकर, हमेसा ऊ जल्दी में चलते हुए देखाई दिए हैं. एक कमरा से निकलते हैं मगर दोसरा कमरा तक पहुँच नहीं पाते. हाँ, हमारी पालतू कुतिया जब तक ज़िंदा थी, अचानक कभी-कभी कोनो अनजान आदमी को देखकर भौंकने लगती थी, जबकि उसके सामने कोनो नहीं होता था.

इन सारी घटनाओं की शुरुआत से पहले:
ऊ रोज अचानक माताजी को गाँव जाना पड़ा. हम-सब बच्चा लोग को बताया गया कि हमरे चचेरे चाचा का अचानक मौत हो गया है. इसीलिये माता जी को गाँव जाना पड़ा. सब लोग सदमा में था. अभी साल भर भी नहीं हुआ था सादी का. उमर केतना रहा होगा, मोसकिल से २८-३० साल. लंबा कद, बलिष्ठ बदन, सुन्दर चेहरा अउर हंसमुख आदमी. उनके मौत का कोई बिस्वास नहीं कर सकता था.
माताजी दोसरा दिन लौटकर आईं. हम बच्चा लोग डर जायेंगे इसलिए बहुत सा बात हमलोग के सामने नहीं किया गया. बाक़ी जेतना बात हमलोग के सामने हुआ उससे बस एतना ही पता चला कि उनका मरा हुआ देह खेत में पड़ा था अउर उस समय ऊ उजला गंजी और पाजामा पहिने हुए थे. पैर में हवाई चप्पल था.

और अंत में:
ऊ कौन है, काहे हैं, कहाँ से आते हैं, कहाँ चले जाते हैं, कहाँ रहते हैं... पता नहीं! मगर आज भी हमरे परिबार के सदस्य हैं... हमलोग के लिए चाचा जी!