शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

चार दिन का जिनगानी में साढ़े तीन दिन त दुनिया भर के लिए चला जाता है, बस ससुरा आधा दिन हाथ में आता है, हमरे अपने लिए. आधा दिन जबर्दस्त गम और दुःख, बाकी का साढ़े तीन दिन जबर्दस्ती का हँसी. हर आदमी एही जुगत में लगा हुआ है कि कईसे ऊ चार दिन का खेला में आधा दिन का दुःख भुलाकर, उसको साढे तीन का खुसी के साथ मिला दे. अब चाहे ऊ खुसी खरीदने से मिले, भीख में मिले, उधार मिले, चाहे चोरी से मिले. एही जुगाड़ में दिन रात एक किए रहता है आदमी.

दिन रात नहीं, खाली दिन, काहे कि रात में त सोना भी जरुरिए है. अब सब आदमी हमरे जईसा निसाचर त नहीं है ना. का करें एतना उमर हो गया, लेकिन अपने लिए कभी टाईम नहीं मिला. सारा दिन ऑफिस, परिवार, बच्चा, पढाई, इम्तिहान, आना जाना, एही में निकल जाता है, अपने लिए कभी टाईमे नहीं मिला.

तब हम चोरी सुरु किए, अपने घर में अपना समय चोराना. जब सब लोग सो जाता, तब हम पढाई करते. जो भी तनी मनी हम पढ़े हैं, रात में पढे हैं, सब के सो जाने के बाद, इत्मिनान से. इसी कारन हमको भोरे जल्दी उठने का बीमारी कभी नहीं लगा. आप लोग भी देखे होंगे कि हमरा सारा टीका टिप्पनी देर रात में होता है. इसी पर एक बार सरिता जी (अपनत्व) हमको समझाईं भी थीं कि एतना देर तक जागना ठीक नहीं है. दू दिन ठीक रहे, बाद में फिर चालू. का करें, अपने आप से मिले बिना रहिओ त नहीं पाते हैं.

अब देरी से सोने के कारन जल्दी उठने का त सवाले पैदा नहीं होता है. सच पूछिए त एही हमरा चिर युवा इमेज का राज है. बच्चे से एगो कहावत सुने थे कि जल्दी सोवो, जल्दी जागो, उठकर माखन मिस्री मांगो. न हम जल्दी सोए, न जल्दी जागे, न हमको माखन मिस्री मिला. न माखन मिस्री मिला, न कॉलेस्ट्रोल अऊर डायबिटीज का समस्या हुआ.

धीरे धीरे ई भेद हमरा सारा दोस्त लोग को पता चल गया. हम भी तब एलानिया डिक्लेयर कर दिए कि हमको रात में दू बजे तक कोई भी आराम से फोन कर सकता है, मिल सकता है, बतिया सकता है, लेकिन सुबह एकदम नहीं. इसीलिए जादातर लोग हमसे राते को मिलता, बतियाता है. एगो बात अऊर, एतवार को एगारह बजे से पहले कोई स्कोप नहीं. एक रोज सिवम मिश्र जी का फोन आ गया, एतवार को भोरे भोरे, हमरा कोनो पोस्ट पर इंस्टेंट ऑडियो टिप्पणी देने के लिए. तकिया से फोन तोप कर सो गए हम. बाद में एगारह बजे फोन किए अऊर छमा मांगकर बतियाए.

ई चक्कर में बहुत नोकसान हुआ है नींद का. लेकिन माँ बाप का आसिर्बाद रहा कि बीमार कहिओ नहीं पड़े, अऊर ऑफिस में कभी नहीं ऊँघे ( ऊ का कहती है हमरी बेटी टच वुड). हमरे एगो सीनियर कहते थे कि ऊ आदमी सुखी है जिसको नींद आ जाता है, ऊ आदमी उससे भी सुखी है जिसको जब चाहे तब नींद आ जाता है, लेकिन दुनिया में सबसे सुखी ऊ आदमी है, जिसको जहाँ चाहे, जब चाहे तब नींद आ जाता है. हम ई सुख से बंचित रहे. का मालूम केतना नींद का बलि चढाए हैं हम.

सोचते हैं, जाते समय डॉ. बच्चन जो बात कहे थे, ऊ सबको बोल जाएंगे कि मरने के बाद हमरा सरीर को 10 – 15 दिन अईसहीं छोड़ देना. ईहो कहेंगे कि कोनो हल्ला गुल्ला, रोना धोना, सोर सराबा मत करना. आराम से सोने देना, ताकि जो नींद हम अपना जिन्नगी में पूरा नहीं कर सके ऊ पूरा हो जाए. उसके बाद हमको धरती माँ के गोदी में सोला देना, काहे कि माँ के गोद से बढिया नींद त कहीं आइए नहीं सकता है. अऊर ई अनिद्रा का रोग भी त माँ का गोदी छोड़ने के बादे लगा है. एगो अऊर बात, भूल से भी आग में मत जलाना. हमको आग से बहुत डर लगता है. गरम रोटियो से हाथ जर जाता है, त बेचैन हो जाते हैं हम.

नाम ऊम का त कोनो चाह है नहीं हमको, न अईसन कोई नामवर आदमी हैं हम, इसलिए जहाँ हमको सो जाएँ, ओहीं एगो पत्थर पर लिखवा देनाः

सिरहाने सलिल के आहिस्ता बोलो
ई बकबक करके, अबके सो गया है.

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

अ-कबिता

ई कबिता लिखकर हमको कोई बहुत खुसी नहीं हुआ था. अऊर सच पूछिए त इसको हम कबिता मानबो नहीं करते हैं. बहुत पहिले ई लिखकर हम कहीं कोना में दबा दिए थे.घटना सच्चा है, काहे कि इसके बाद हमरी बिटिया एतना हँसी थी कि पूछिए मत. लेकिन हमरा मन बहुत उदास था. आज भी जब पढ़ाई करने का उमर में छोटा छोटा बच्चा को तरकारी बजार में धनिया मिर्चाई बेचते हुए, चौराहा पर भाग भाग कर कलम, पेंसिल अऊर किताब बेचते हुए, कोलोनी के अंदर कचरा बीनते हुए देखते हैं, त लगता है कि केतना बड़ा झूठ सिखाया गया है बचपन से हमको कि बच्चा देस का भबिस्स होता है. अगर एही भबिस्स है, त अईसा भबिस्स देखने से पहिले आँख बंद हो जाए!


रास्ते भर मैं बहाने सोचता बैठा रहा
कि क्या कहूँगा
जब मेरी बिटिया, पहुँचने पर मेरे, मुझसे कहेगी
“लाए क्या मेरे लिए ऑफिस से
डैडी, आज तुम?”

ये कहूँगा, वो कहूँगा
ये कहा तो मान जाएगी,
कहा वो तो, बहुत चिल्लाएगी
ऐसा कहूँगा, और फिर वैसा कहूँगा
क्या कहूँगा, सोचकर धुनता रहा सिर.

जैसे ही गाड़ी से बाहर पैर रखा
एक छोटी सी बड़ी प्यारी सी बच्ची
बस मेरी बिटिया के जैसी
पर वो लिपटी थी फटे गंदे से कपड़ों में
पकड़ कर हाथ मेरा
प्यार से, करुणा से, और कुछ दर्द से
बोली वो मुझसे,

“पाँच नींबू ले लो अंकल जी
हैं बस ये पाँच रुपये के
बचे हैं पाँच केवल
ले लो अंकल जी, न मुझसे!”
हाथ मेरा ख़ुद ब ख़ुद सरका फिर अपनी जेब में
और पाँच रुपये के ख़रीदे पाँच नींबू.

घर पे बिटिया थी खड़ी दरवाज़े पे
बस देखते ही शोर करने लग पड़ी
“क्या लाए डैडी!
बोलो ना क्या लाए डैडी!”

मुस्कुराते मुस्कुराते सारे नींबू
दे दिए फिर हाथ में बिटिया के मैंने
ख़ूब ज़ोरों से हँसी फिर खिलखिला के
“ये भी कोई चीज़ है लाने की”
और उसकी हँसी रुकती नहीं थी.

पाँच नींबू ने मेरी बिटिया को जब इतना हँसाया
कितना ख़ुश होगी वो प्यारी नन्हीं बच्ची
पाँच रुपये में मुझे वो सारे नींबू बेचकर!

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

छोटा छोटा सीख !

जिन्नगी से बड़ा कोई मास्टर नहीं है, लेकिन जिन्नगी त कोनो देखाई देने वाला चीज नहीं है, इसीलिए आस पास जेतना आदमी, जानवर, पंछी, पेड़-पौधा अऊर जीव-जंतु है, सब को ध्यान से देखने का जरुरत है. जइसे किसी भी भेस में नारायण मिल जाते हैं, उसी तरह सिखाने वाला गुरू भी मिल जाता है. जो भी मिलता है, जाते-जाते कुछ न कुछ सिखा के जाता है. नहीं कुछ, त अनुभव त देइये जाता है.

एक बार का बात है. हम लोग ट्रेन से कलकत्ता से पटना जा रहे थे. गाड़ी में एगो सज्जन चिनिया बादाम (मूँगफली) खा रहे थे, अऊर छिलका ओहीं जमीन पर गिराते जा रहे थे. हम लोग का आदत है कि सब छिलका एगो अखबार में लपेट कर बाहर फेंक देते हैं. ऊ भाई जी मान के बईठे थे कि रेलवे उनका सम्पत्ति है (ई भुला गए थे कि उसमें हमनियो का सेयर है). दू चार बार उनके तरफ देखने से भी उनको बुझा नहीं रहा था. हमरी बिटिया बहुत छोटी थी उस समय. अचानके बोली, “डैडी! छिलका जमीन पर गिराना गंदी बात होती है ना!” एतना सुनने के बाद ऊ भाई जी को समझाने का जरूरत नहीं पड़ा. ऊ चुपचाप सब छिलका जमीन पर से उठाए अऊर बाहर फेंक कर आए. अब बताइए ऊ सज्जन सोचबो नहीं किए होंगे कि एगो बच्चा मास्टर बन जाएगा उनका.

परिवार में पहिला गुरू माँ बाप होता है. लेकिन हमरे स्वर्गीय पिता जी हमलोग से पढाई लिखाई का बात बहुते कम किया करते थे. बाकि सिनेमा, कहानी, उपन्यास, कबिता, संगीत का बात त जहाँ बईठे ओहीं सुरू. “मैं पिया तोरी, तू माने या न माने” – ई गाना में जो बाँसुरी सुनाई दे रहा है, ऊ पन्ना लाल घोष का बजाया हुआ है, “नाचे मन मोरा मगन” – इसमें गोदई महाराज तबला बजाए हैं, ऐसहीं न मालूम केतना जानकारी ऊ खेल खेल में दे देते थे. फिलिम के बारे में उनका जानकारी एतना जबर्दस्त था कि ग्रुप डांस में तीसरा लाईन में डांस करने वाली लड़की को देखकर बता देते थे कि ई मास्टर सत्यनारायण की असिस्टेंट है. फिलिम तकनीक का बहुत सा बारीकी उनसे सीखे हैं हम, आज से केतना साल पहिले.

आप कभी सोचे हैं कि जऊन कागज में मूँगफली लपेट कर रोड के किनारे बेचता है, ऊ भी देता है ज्ञान हमको. हमरे एगो अंगरेजी के मास्टर थे, ओही बताए थे एक बार. बोले कि मूँगफली खाने के बाद कागज को फेंकना नहीं चाहिए. कागज अगर अंगरेजी के अखबार का है, त एक बार उसको पढो. हो सकता है कि उसमें लिखा हुआ सब सब्द तुमको मालूम होगा. इससे कोनो नोकसान नहीं है, दोबारा पढने से तुमरा जानकारी दोहरा जाएगा. ईहो हो सकता है कि कुछ सब्द का नया प्रयोग भी तुमको पता चले. लेकिन अगर सब्द नया हुआ त उसको नोट करो, घरे जाकर डिक्सनरी में देखो अऊर ऊ मूँगफली वाला को धन्यवाद दो कि ऊ अनपढ आदमी, अनजाने में तुमको नया सब्द सिखा गया.

अंत में एक बार फिर अपने पिताजी का एगो सीख बता दें. ई त अईसा सीख है कि हम बुढ़ापा तक उसका पालन कर रहे हैं. पिताजी बताते थे कि अगर कोई तुमसे पूछे कि कैट माने का होता है अऊर तुमको नहीं मालूम है, त बिना सोचे तुरत बोल दो कि नहीं मालूम. ई बोलने से तुमरा एक नम्बर कटेगा, लेकिन कभी गलतियो से कैट माने कुत्ता मत बोलना, नहीं त तुमरा चार नम्बर कट जाएगा. जानते हो कईसे... कैट माने कुत्ता बोलने का मतलब है कि तुमको, कैट का हिंदी, बिल्ली का अंगरेजी, कुत्ता का अंगरेजी अऊर डॉग का हिंदी भी नहीं मालूम. एगो गलत जवाब दिए अऊर चार नम्बर साफ.

सुनने में ई चुटकुला लगता है, लेकिन जिन्नगी का बहुत बड़ा सीख है. हमलोग हमेसा झिझकते हैं ई बोलने में कि हम नहीं जानते हैं, खासकर अपना बच्चा, चाहे अपने से छोटा से. उसका छोटा होने का नाजायज फायदा उठाकर, हम उसको गलत जवाब देकर, अपना अज्ञानता छिपाते हैं. लेकिन ई सीख मिलने के बाद महसूस हुआ कि एगो गलत जवाब देकर, हम ऊ बच्चा के नजर में गिरें चाहे नहीं गिरें, अपना नजर में चार गुना नीचे गिर जाते हैं.

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

छोटकी


छोटकी अठारह साल के उमर में बिआहकर बनारस से पटना आई. ससुराल में बहुत जमीन जायदाद, खेत, अनाज मिला, अऊर साथ ही मिला जिम्मेवारी, दू गो ननद के बिआह का, घर का बड़की दुलहिन जो ठहरी. बोली का अंतर, बनारसी बोली से ठेठ मगही परिवार. घर में खड़ी हिंदी बोलने से लोग बाग कहता था कि दुलहिन अंगरेजी बोलती है. नैहर में अमीरी के बाद पैदा हुआ गरीबी के कारन पढ़ाई मिडिल के बाद होबे नहीं किया.

दू साल बाद पति को अच्छा नौकरी टूण्डला में मिल गया, त ऊ ओहीं चली गई. इस बीच सास चेचक में माता का भेंट चढ़ गईं. तीन साल बाद जब टूण्डला से इलाहाबाद बदली हुआ, त पटना में ससुर का तबियत बहुत सीरियस हो गया.तीन बच्चा को लेकर ससुर का देखभाल करने के लिए छोटकी पटना आ गई, अऊर पटना का होकर रह गई. पति रेलवे के नौकरी में थे, इसलिए आते जाते रहते थे.

पटना आने के बाद पता चला कि खेती बाड़ी बहुत है, केतना है अऊर कहाँ है इससे घर में किसी को मतलब नहीं था. खाने भर अनाज आ जाता था बस. छोटकी अपने देवर को लेकर गाँव में घूमी, लोग से मिली. सारा हिसाब किताब, खेत कऊन आदमी जोतेगा, केतना अनाज मिलेगा, सब कुछ ठीक ठाक करके पटना वापस आ गई. उस साल हर साल के तुलना में सबसे जादा अनाज घर में आया, अऊर फिर एही सिलसिला चलता रहा. ससुर का तबियत ठीक होने लगा था.

ननद का सादी हो गया, देवर का नौकरी हो गया अऊर बच्चा लोग बड़ा होने लगा. अच्छा इस्कूल में एडमिशन करवा दिया गया. बच्चा लोगों से छोटकी ने खाली दू बात कहा, “हम कम पढ़े लिखे हैं, अऊर तुम लोग का पढ़ाई में मदद भी नहीं कर सकते हैं. इसलिए सही गलत जो भी है, तुम लोग के ऊपर छोड़ देते हैं. बस हमको धोखा मत देना. दोसरा बात कि तुमरे पापा एहाँ नहीं रहते हैं, इसलिए अईसा कोई काम मत करना जिससे हमको ई सुनने का मौका मिले कि माँ को सम्भालने नहीं आया इसलिए बच्चा बिगड़ गया.”

बच्चों का फीस देने छोटकी खुद इस्कूल जाती थी. इसी बहने क्लास टीचर से मुलाक़ात होकर बच्चों का पढ़ाई का बारे में पता चल जाता था, गौर करने वाला बात ई है कि उस समय पी.टी.एम. का रिवाज नहीं था. इससे एगो अऊर फायदा हुआ. छोटकी आस पास का कुछ गरीब लोग का हमेसा मदद करती थी. छोटकी के इस्कूल में पहचान के कारन ऊ गरीब लोग का बच्चा का दाखिला में दिक्कत नहीं हुआ.

बच्चा लोग पढ़ता गया, रिजल्ट अच्छा करता रहा. छोटकी का समाज सेवा छोटा स्तर पर जारी रहा. किसी का बच्चा बीमार हुआ त हस्पताल ले जाना, डॉक्टर को देखाना, किसी का घर में सादी है त उसके साथ जाकर समान खरीदवाना, घर का अनाज से, पईसा से मदद करना. देखते देखते छोटकी, आस पास की बड़की दुल्हिन बन गई. सारा ससुराल में लोग बोला कि लगता है, सास का आत्मा उसमें समा गया है.

बहुत सा परेसानी भी आया, बहुत लोग का ताना भी सुनने को मिला. लेकिन उसके ऊपर कोनो असर नहीं होता था. अईसा लगता था कि ऊ अपना मंजिल जानती है अऊर ओहाँ तक कईसे जाना है ई भी फैसला ऊ कर चुकी है.

बच्चा लोग ठीक से पढता था त ऊ सिनेमा देखाने भी ले जाती थी. अनुसासन अईसा कि साम सात बजे सब लोग खेल कर घर में, कभी कोर्स का किताब में लुका कर कोनो बच्चा कहानी का किताब नहीं पढ़ा. देवर को सिगरेट पीने का आदत था, लेकिन मजाल नहीं कि कोई बच्चा को बोलें कि सामने वाला दोकान से सिगरेट ला दो. एक बार बोले थे त छोटकी पईसा लेकर अपने चली गई अऊर सिगरेट लाकर दे दी. देवर को काटो त खून नहीं. छोटकी बोली, बऊआ! सिगरेट लाने के लिए हमको बोल दीजिए, लेकिन बच्चा लोग नहीं जाएगा. ऐसहीं आदत लगता है.

पति जब जब इलाहाबाद से आते, बच्चा लोग के साथ कहानी,कबिता अऊर सिनेमा का बात बतियाते. छोटकी बहुत गोस्साती, त बोलते, तुम पढा‌ई के लिए बोलिए रही हो न, त हमको मनोरंजन करने दो बच्चा लोग का.

ऊ घर में घर का काम, अऊर बाहर में समाज का काम करती रही. सब का सादी बिआह, नौकरी हो गया. कायस्थ परिवार में, खास कर बिहार में, जहाँ लोग सब खेत बेचकर सहर में मकान बना लिए, छोटकी खेत को बढाई, अऊर आज भी सब खेत सुरक्षित है. बच्चा लोग अपना अपना मकान बनवा लिया, लेकिन सब साथे रहता है.

पति के गुजर जाने के बाद भी छोटकी का अनुसासन बना है, जो बच्चा बाहर नौकरी करता है, ऊ लोग भी छ्ठ में घर आता है. छ्ठ पूजा में सब मेहमान का स्वागत करना, पड़ोस के लोगों को न्यौता देना, बगल का अनपढ लोगों को बैंकिंग सिखाना, आज भी चलता है. कभी कोई बच्चा,जो अब बच्चा का बाप हो चुका है, मजाक में छोटकी का गलती निकाल दे, तो एक्के जवाब होता है कि पढा लिखा के काबिल बना दिए हैं , त माँ का गलती निकालते हो.

लेकिन सब को पता है कि ई मजाक है. देह साथ नहीं देता है , मगर आज भी कोई आकर बोले कि ई काम आप ही करवा सकती हैं, त उठ कर तैयार हो जाती है. रिटायरमेंट का उमर त कहिए निकल गया. लेकिन छोटकी कहाँ रिटायर होना चाहती है.
बहुत पागल है हमरी माँ, रेलवे का पास होते हुए भी टिकट कटाकर हमसे मिलने के लिए दिल्ली चली आती है. हमरी सिरीमतीजी को ठण्डा में कपड़ा धोते देखकर, पेंसन के पईसा से वासिंग मसीन खरीद देती है.
माँ कभी रिटायर नहीं होती!!

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

गाली का आनंद!!

लगता है, अभी तक जो इज्जत आप लोग के बीच हम कमाएँ हैं, ऊ ई पोस्ट का सीर्सक देखकर मट्टी में मिल जाने वाला है. लेकिन हम भी त अपना दिमाग से मजबूर हैं. हमरे नजदीकी दोस्त लोग को मालूम है कि हमरे दिमाग में जब प्रसव पीड़ा होता है, त जब तक प्रसव न हो जाए, तब तक हम परेसान रहते हैं. अऊर प्रसव के बाद त बच्चा जईसा हो, हमरा है… परवाह भी नहीं करते कि बच्चा सुंदर है कि बदसूरत, काहे कि बच्चा त बच्चा होता है, अपना सरीर का हिस्सा. बदसूरत होगा त काट के फेंक त नहिंए देगा कोई. इसीलिए ई बचवा का नाम देखकर मत भाग जाइएगा, तनी रुककर मुँहो देख लीजिएगा.

गाली सभ्य समाज में बर्जित माना जाता है. लेकिन जगह अऊर लोग के हिसाब से गाली भी हमलोग का जिन्नगी में अईसा घुल मिल गया है कि आम बात चीत का हिस्सा लगने लगने लगता है. कलकत्ता में साला सब्द बहुत धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है. दिल्ली का लोग त घरवो में ऊ गाली बोल कर बतियाता है, जो हम लोग बाहरो बोलें त जीभ कट जाए. कमीना त आजकल लोग प्यार से भी बोलता है.

लेकिन कभी सुने हैं कि घर पर न्यौता देकर लोग बाग को बोलाइए, आदर सत्कार कीजिए, उनको प्रेम से बईठाइए, खाना परसिए अऊर जब खाना सुरू करें त जम के गारिआइए. अरे! झूठ नहीं बोल रहे हैं हम, पूरा घर भर मिलकर गाली बकता है, चुन चुन कर, एक एक आदमी को, उसका नाम ले लेकर. अगर सचो अईसा होता है, त आप सोचिएगा कि मारा पीटी हो जाता होगा. लोग खाना छोड़कर भाग जाता होगा.

लेकिन अईसा नहीं होता है. लोग बहुत प्यार से खाता है, अऊर गाली का आनंद भी लेता है… ऐसे काहे देख रहे हैं हमको, पगलाए नहीं हैं हम. ई बिहार अऊर उत्तर परदेस का घर घर में होता है. अऊर गाली का ई परम्परा, बड़ा छोटा, ऊँच नीच, अमीर गरीब का भेद भाव के बिना पालन किया जाता है. बिहार के हर सादी में लड़का वाला लोग जब बरात लेकर लड़की के दरवाजा पर जाता है, त दुल्हा को छोड़कर, सब को गाली सुनने को मिलता है, लड़की वाला के तरफ से. जहाँ एक तरफ बूढ़ पुरनियाँ लोग मसगूल रहती हैं गीत गाने में कि
                  पुरबा पछिमवा से अईलें सुंदर दुल्हा
                  जुड़ावे लगिलन हे! सासू अपने नयनवा!!
वहीं जवान लड़की लोग छोटा-छोटा बच्चा को फुसलाकर उनके चाचा, फूफा, मौसा, मामा, भाई लोग का नाम पूछने में बिजी रहती हैं. नाम पता लगाकर, सब नाम औरत लोग के हवाले. गाली देने वाला लोग का नेट्वर्क एतना तगड़ा है कि पूछिए मत. दू मिनट में लड़का वाला का पूरा कुटुम पुरान लड़की वाला के पास पहुँच जाता है.

अब जब खाने का टाईम आया, तब फायरिंग सुरू. औरत लोग अईसा अईसा गाली का गोली दागती हैं कि पूछिए मत. सब लोग का नाम त पते रहता है, बस फलनवा की बहिनी भाग गई फलनवा के साथ. कोई भी नहीं बचता है ई गाली से. जिस जिस आदमी का नाम आता है, उसका हँसते हँसते बुरा हाल हो जाता है, लेकिन कोई बुरा नहीं मानता.

केतना बार लड़का वाला लोग चलाकी से अपना सही नाम नहीं बताकर लड़कीए वाला पार्टी का नाम बता देता है. बस गाली चालू होते ही सब लोग ठठाकर हँस देता है, तब पता चलता है कि अपने अदमिया को गाली दिया जा रहा था.

ई गाली में एतना प्यार छिपा होता है कि पूछिए मत. गाली से संबंध मधुर होने का ई एकमात्र उदाहरन है. ई गाली का सबसे मधुर उदाहरन एगो रामलीला का है,जो हमरी माता जी सुनाती थीं.रामचंद्र जी जब सादी के लिए जनकपुर गए, त ओहाँ सीता जी के घर की औरत लोग राम जी से बोलीं, “ कमाल है आप के अजोध्या में. जनकपुर में त बहुत सा कुमारा लोग है, अऊर आपके पिताजी को तीन तीन रानी हैं. एगो इधरो भेजवा दीजिए. कुमारा का कल्यान हो जाएगा.”

इसी बात को हिंदी फिलिम के बिबाह इस्पेस्लिस्ट राजश्री फिलिम्स वाला लोग एगो सिनेमा में गाना में कहा था, "बता द बबुनी, लोगवा देत काहे गारी". आवाज सारदा सिन्हा का जिसमें बिहार के माटी का महँक है, जहाँ गाली बकने से ज्यादा, गाली सुनने वाला आनंद लेता है.

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

काला कागा

एगो बुझऊवल बुझाएँ. कऊन सा अईसन भासा है जो पूरा दुनिया में बोला जाता है?  ई भासा अदमी, जानवर अऊर पंछी तक बोलता अऊर समझता है. ई भासा पढने के लिए, समझने के लिए कोनो इस्कूल जाने का जरूरत नहीं है, न कोनो किताब कॉपी, कलम दवात, बही खाता का जरूरत है.
सब अदमी हमरा जईसा बेकूफ थोड़े है कि नहीं समझेगा. हमको मालूम है कि आप सब लोग बूझ गए होंगे, एही से हम ईनाम नहीं रखे थे. ई भासा है प्यार का भासा, ममता का भासा, दुलार का भासा. अपना एगो दोस्त नबीन जी के घर गए हुए थे चंडीगढ. सबेरे उठ के देखते हैं कि साह्ब किचन से निकल रहे हैं. हम चुटकिया दिए कि का बात है भाई जी सबेरे सबेरे किचन में डिऊटी दे रहे हैं. तब तक पीछे से शशि भाभी आ गईं (नबीन जी की सिरीमती जी). हम बोले कि एतना बड़ा गेस्ट त नहिंए हैं हम कि आप दुनो अदमी किचन में लगे हैं. तब शशि भाभी बताईं, “अरे भाई साहब! किचन के खिड़की में रोज एक कौआ आ जाता है, बेचारे की एक ही टाँग है. और जब तक रोटी न दो काँव काँव चिल्लाता रहता है. इनका नाश्ता भले न पैक हो पर कागा जी का नागा नहीं होना चाहिए.”

हम ठहरे सेंटीमेंटल अदमी, बस ई प्यार का भासा टच कर गया हमको. अऊर चट से एगो तुकबंदी कर दिए. देखिए शशि भाभी का पंछी प्रेम, हमरे नजर से...


काला कागा
एक टाँग पर
रोज़ रसोई घर की खिड़की पर आ जाता
और सुबह की रोटी पाने को कस कर आवाज़ लगाता.

शशि ने भी
हर रोज़ उसे
उसके आवाज़ लगाने से पहले ही जाकर
रोटी उसकी चोंच में देने का एक नियम बना रखा है.

फिर एक दिन वो
कागा आया
साथ में दो साथी भी आए
लगता है कि सालगिरह थी कागा की और पार्टी दी थी.

कल थोड़ी सी
देर से जागी
जगते ही वो दौड़के भागी
चला गया था काला कागा काँ काँ करके बिन रोटी के.

साधु कहीं भी
एक बार ही
हैं पुकारते और बढ़ जाते
शशि सोचती काला कागा भूखा आज रहेगा दिन भर.
 
(पुनश्च: बहुत कोसिस किए, लेकिन कागा बाबू फोटो खिंचाने के लिए तैयार नहीं हुए.)
 

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

भगवान ने चाहा - इंशा अल्लाह!!

हम त कभी सोचबो नहीं किए थे कि देस छोड़कर बिदेस में नौकरी करने का मौका मिलेगा. अऊर जब मौका मिला त हमरे घर में मातम छा गया. कुछ चुना हुआ लोग को हर साल हमरा ऑफिस बिदेस में पोस्टिंग करता है. गलती से हमको भी चुन लिया गया अऊर शारजाह भेजने का खबर आ गया. पटना फोन करके खुसखबरी दिए त मातम छा गया घर में. एक त एतना दिन के लिए बाहर अऊर दोसरा इस्लामी देस में रहना, ऊ भी हमरा जईसा ठेठ साकाहारी आदमी के लिए. हमरी सिरीमती जी त सिया सुकुमारी, राम के साथ बनवास जाने के लिए भी तैयार, बचिया ई सब समझ बूझ से बाहर थी, उसके लिए का कलकत्ता अऊर का शारजाह.
खैर, ओहाँ पहुँचे त काम का रूटीने अलग था. सबेरे आठ बजे से दोपहर बारह बजे तक ऑफिस, फिर साम को चार बजे से नौ बजे रात तक. बीच में आराम से चार घंटा का नींद. साल का 362 दिन काम. लेकिन ई रूटीन में सबसे बड़ा नोकसान हुआ हमरी सिरीमती जी का. सोसल लाईफ त एकदमे खतम. अनजान जगह, अनजान लोग, अनजान भासा (मलयालम हमरी सिरीमती जी को नहीं आता है, अऊर पास पड़ोस में खाली मलयाली लोग रहता था). हमरा भासा सुनने के लिए उनको सारा दिन इंतजार करना पड़ता था. बेटी भी इस्कूल से आधा दिन बादे आती थी.
लेकिन पानी अपना सतह खुदे खोज लेता है. हमरी सिरीमती जी को ई दोस्ती के पानी का सतह तीन घर हिंदुस्तानी छोड़कर, एगो पाकिस्तानी परिवार में मिला. बीच का तीन घर दक्षिन भारतीय मलयाली का था, अऊर ऊ लोग कोई बतियाता भी नहीं था, काहे कि हिंदी नहीं समझता था. पाकिस्तानी परिवार में हमरी सिरीमती जी को उर्दू बोलने वाली सहेली मिल गई. उर्दू त एकदम हिंदिए जईसा भासा है, कोनो दिक्कत नहीं होता है समझने में, हमरी सिरीमती जी का कहना था.
औरत लोग का दोस्ती, फिर बच्चा लोग का दोस्ती, फिर मर्द लोग का दोस्ती. बातचीत, फिर घर आना जाना, फिर बर्थ डे, मैरेज डे, फिर साथ घूमना फिरना. दोस्ती एतना बढ गया कि उनके घर पर पाकिस्तान से आने वाला उनका रिस्तेदार लोग भी हमरे घर आने जाने लगा. बाकी साल भर बाद जो घटना हुआ, ऊ हमरा दिल को छू गया. हमलोग पटना जाने वाले थे. जाने के एक रोज पहिले रात में शह्जादी भाभी हमरे घर आईं, हाथ में एगो झोला था. ऊ झोला में पटना में हमरे माँ के लिए साड़ी, अऊर छोटा भाई की दुलहिन के लिए सूट का कपड़ा था, अऊर बेटा के लिए ड्रेस. साथ में काजू बादाम. हमरे मुँह से त आवाजे नहीं निकला, लेकिन ऊ बोलीं, “भाई जान, पहली बार जा रहे हैं आप लोग. हमारा ज़िक्र किया है आपने घर पर. हमारी तरफ से कुछ सौग़ात नहीं ले गए तो लोग क्या सोचेंगे”. हम कुछ कहिए नहीं पाए, मगर दिल भर गया हम लोगों का. दोसरा दिन जब निकलने लगे घर से तो शहज़ादी भाभी हाथ में क़ुरान पाक लेकर आईं अऊर बोलीं कि क़ुरान पाक के साए में घर से बाहर निकलिए, अल्लाह की हिफ़ाज़त में.
दीवाली के रोज साम को ऑफिस से लौटे त अपना घरे पहिचान में नहीं आ रहा था. हमरे घर का पूरा पर्दा अऊर सोफा का कभर एकदम नया हो गया था. पता चला कि दिन भर बईठ कर शहज़ादी भाभी हमरे घर का पर्दा अऊर कभर सिलाई कर दीं, बोलीं इतना ख़ूबसूरत त्यौहार है और पुराने पर्दे. उनका बच्चा लोग आकर बोला कि आण्टी हम लोगों ने दीवाली सिर्फ हिंदी फिल्मों में देखी है. आपके साथ दीवाली मना सकते हैं हम. अब ई त कोनो मना करने वाला बाते नहीं था. अपने फ्लैट के अंदर में मोमबत्ती जलाकर सबके साथ दीवाली मनाए.
हम त ऑफिसे में ओझराए रहते थे, लेकिन ऊ लोग कहीं भी घूमने जाता था त हमरा परिवार के लोग को साथ ले जाता था. पाकिस्तान से उनका कोई रिस्तेदार आया त हमए घर के लिए सौगात लेकर आता था. दुबई, अबू धबी में उनका जेतना परिवार था सब हम लोग का परिवार जईसा था, हमरी सिरीमती जी के कारन.
आज भी हमरी सिरीमती जी के गला में एक लॉकेट है जिसपर अंगरेजी का अक्षर S बना हुआ है. लोग समझता है कि ऊ हमरा नाम है, लेकिन S का माने है शहज़ादी, उनका सबसे अच्छा दोस्त, लेकिन पाकिस्तानी. अईसने एगो लॉकेट उनके गला में भी है,जिसमें हमरी सिरीमती जी का नाम है.
जब हम लोग लौट कर भारत आए, त अईसा लगा कि हम अपना पूरा परिवार छोड़कर आ रहे हैं. जावेद भाई और शह्ज़ादी भाभी, आज भी फोन करते हैं. लेकिन पाँच मिनट के कॉल में आज भी दू मिनट त ऊ दुनो औरत लोग के रोने में निकल जाता है.
आज भी ऊ लोग एक्के बात बोलता हैं, “भाई जान! अगर हालात सुधर जाएँ, तो एक बार हमारे यहाँ आप ज़रूर तशरीफ़ लाना." हमरा जवाब होता है, " इंशा अल्लाह!” मगर जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो बस अमन का आसा लिए बैठे हैं,  अऊर मुनव्वर राना साहब का सेर पर बिचार कर रहे हैं:
              सियासत नफ़रतों का ज़ख़्म भरने ही नहीं देती
              जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है.