चार दिन का जिनगानी में साढ़े तीन दिन त दुनिया भर के लिए चला जाता है, बस ससुरा आधा दिन हाथ में आता है, हमरे अपने लिए. आधा दिन जबर्दस्त गम और दुःख, बाकी का साढ़े तीन दिन जबर्दस्ती का हँसी. हर आदमी एही जुगत में लगा हुआ है कि कईसे ऊ चार दिन का खेला में आधा दिन का दुःख भुलाकर, उसको साढे तीन का खुसी के साथ मिला दे. अब चाहे ऊ खुसी खरीदने से मिले, भीख में मिले, उधार मिले, चाहे चोरी से मिले. एही जुगाड़ में दिन रात एक किए रहता है आदमी.
दिन रात नहीं, खाली दिन, काहे कि रात में त सोना भी जरुरिए है. अब सब आदमी हमरे जईसा निसाचर त नहीं है ना. का करें एतना उमर हो गया, लेकिन अपने लिए कभी टाईम नहीं मिला. सारा दिन ऑफिस, परिवार, बच्चा, पढाई, इम्तिहान, आना जाना, एही में निकल जाता है, अपने लिए कभी टाईमे नहीं मिला.
तब हम चोरी सुरु किए, अपने घर में अपना समय चोराना. जब सब लोग सो जाता, तब हम पढाई करते. जो भी तनी मनी हम पढ़े हैं, रात में पढे हैं, सब के सो जाने के बाद, इत्मिनान से. इसी कारन हमको भोरे जल्दी उठने का बीमारी कभी नहीं लगा. आप लोग भी देखे होंगे कि हमरा सारा टीका टिप्पनी देर रात में होता है. इसी पर एक बार सरिता जी (अपनत्व) हमको समझाईं भी थीं कि एतना देर तक जागना ठीक नहीं है. दू दिन ठीक रहे, बाद में फिर चालू. का करें, अपने आप से मिले बिना रहिओ त नहीं पाते हैं.
अब देरी से सोने के कारन जल्दी उठने का त सवाले पैदा नहीं होता है. सच पूछिए त एही हमरा चिर युवा इमेज का राज है. बच्चे से एगो कहावत सुने थे कि जल्दी सोवो, जल्दी जागो, उठकर माखन मिस्री मांगो. न हम जल्दी सोए, न जल्दी जागे, न हमको माखन मिस्री मिला. न माखन मिस्री मिला, न कॉलेस्ट्रोल अऊर डायबिटीज का समस्या हुआ.
धीरे धीरे ई भेद हमरा सारा दोस्त लोग को पता चल गया. हम भी तब एलानिया डिक्लेयर कर दिए कि हमको रात में दू बजे तक कोई भी आराम से फोन कर सकता है, मिल सकता है, बतिया सकता है, लेकिन सुबह एकदम नहीं. इसीलिए जादातर लोग हमसे राते को मिलता, बतियाता है. एगो बात अऊर, एतवार को एगारह बजे से पहले कोई स्कोप नहीं. एक रोज सिवम मिश्र जी का फोन आ गया, एतवार को भोरे भोरे, हमरा कोनो पोस्ट पर इंस्टेंट ऑडियो टिप्पणी देने के लिए. तकिया से फोन तोप कर सो गए हम. बाद में एगारह बजे फोन किए अऊर छमा मांगकर बतियाए.
ई चक्कर में बहुत नोकसान हुआ है नींद का. लेकिन माँ बाप का आसिर्बाद रहा कि बीमार कहिओ नहीं पड़े, अऊर ऑफिस में कभी नहीं ऊँघे ( ऊ का कहती है हमरी बेटी टच वुड). हमरे एगो सीनियर कहते थे कि ऊ आदमी सुखी है जिसको नींद आ जाता है, ऊ आदमी उससे भी सुखी है जिसको जब चाहे तब नींद आ जाता है, लेकिन दुनिया में सबसे सुखी ऊ आदमी है, जिसको जहाँ चाहे, जब चाहे तब नींद आ जाता है. हम ई सुख से बंचित रहे. का मालूम केतना नींद का बलि चढाए हैं हम.
सोचते हैं, जाते समय डॉ. बच्चन जो बात कहे थे, ऊ सबको बोल जाएंगे कि मरने के बाद हमरा सरीर को 10 – 15 दिन अईसहीं छोड़ देना. ईहो कहेंगे कि कोनो हल्ला गुल्ला, रोना धोना, सोर सराबा मत करना. आराम से सोने देना, ताकि जो नींद हम अपना जिन्नगी में पूरा नहीं कर सके ऊ पूरा हो जाए. उसके बाद हमको धरती माँ के गोदी में सोला देना, काहे कि माँ के गोद से बढिया नींद त कहीं आइए नहीं सकता है. अऊर ई अनिद्रा का रोग भी त माँ का गोदी छोड़ने के बादे लगा है. एगो अऊर बात, भूल से भी आग में मत जलाना. हमको आग से बहुत डर लगता है. गरम रोटियो से हाथ जर जाता है, त बेचैन हो जाते हैं हम.
नाम ऊम का त कोनो चाह है नहीं हमको, न अईसन कोई नामवर आदमी हैं हम, इसलिए जहाँ हमको सो जाएँ, ओहीं एगो पत्थर पर लिखवा देनाः
सिरहाने सलिल के आहिस्ता बोलो
ई बकबक करके, अबके सो गया है.

