शनिवार, 29 मई 2010

कीचड़ में कमल - चरन कमल

हमरा त आदत है देर से सोकर उठने का. लेकिन जईसहीं हमरा नींद खुला, देखे कि राजू आँख बंद किए चला जा रहा है. घबड़ा गए हम कि इसको नींद में चलने का बीमारी है, ई त हमको पते नहीं था. हमरा एतना अच्छा दोस्त अऊर ई बीमारी… कभी बोलबे नहीं किया. हमरा सोच तनी थम गया, जब हम देखे कि राजू बाहर से भीतर आ रहा है, एकदम दुनो आँख खोले. चकरा गए हम कि ई का तमाशा है.
अभी हम आँख मट्मटा रहे थे कि ऊ हमरा दसा समझ कर बोल दिया, “देखो बाबू! हम सबेरे सबेरे सबसे पहिले अपना माँ बाप का चरन का दर्सन करते हैं, तब आँख खोलते हैं.”
हमरा मन भर गया. ऊ समय हमरा उमर 15-16 साल था, अऊर हमको ई राजू का घर छोड़कर कहीं भी रात भर रुकने का इजाजत नहीं था. राजू संगीतकार घर का लड़का था, अऊर हमरे अंदर तब तक साहित्त का कैंसर घर बना लिया था. हम जानते थे कि ई साहित्त हमरे जान के साथे जाएगा. राजू गजल गाता था, लेकिन कौन सा गजल गाना है, ई हमरा चोएस होता था. उसका धुन जब तक हम फाईनल नहीं कर देते थे, तब तक ऊ फाईनल नहीं होता था. इसी चक्कर में अगर कभी उसको रात में 10 बजे कोई धुन सूझ गया त ऊ भाग कर हमरे पास आता, हमरी माँ से परमिसन लेकर हमको ले जाता.
लेकिन ऊ दिन उसके अंदर का एक अच्छा संस्कारी अदमी हमको देखाई दिया. दू कमरा का छोटा सा घर में चार भाई बहन और माता पिता, छः लोगों का परिवार बहुत प्रेम से रहता था, एक सदस्य हम भी थे ऊ परिवार के.
*****
हम दूनो एक साथ नौकरी सुरू किए, ऊ पटना में, अऊर हम बाहर. हम नौकरी करते रहे, ऊ नौकरी के साथ गजल गायक बनने का तैयारी में लगा रहा. खबर मिलता रहा, मिलना कुछ कम हो गया.एक दिन ऊ बताया कि हिंदुस्तान के उस समय का एक मसहूर गजल गायक (नाम जानकर नहीं लिख रहे हैं) का साली के साथ ऊ सादी करने जा रहा है. हम सादी में नहीं जा पाए.
कुछ टाइम के बाद हम भी पटना आ गए. मिलना तबो कमे रहा. गुरु पूर्णिमा के प्रोग्राम में हम ऐंकरिंग कर रहे थे, अऊर राजू अपना पत्नी के साथ डुएट गजल गा रहा था. पत्नी के जैसा, गजल का चोएस भी उसी का था.
एक रोज रविवार के दिन, भोरे भोरे ऊ हमरे घर पहुँचा. हम घबड़ा गए कि का हुआ. ऊ हमरे हाथ में कागज पर एगो पता लिख कर दिया, अऊर कहा, “हमरे घर चले जाओ. वहाँ हमरा कुछ समान है. सब एगो बक्सा में डाल कर ई पता पर पहूँच जाओ.”
हम बोले, “बात का है?”
“कुछ नहीं .हम आजकल अपना पत्नी के साथ इसी पता पर रहते हैं, घर से अलग.”
हमरे लिए त सब खबर हैरान करने वाला था. जो मकान में छः आदमी एकट्ठा रह सकता है, उसमें पाँच आदमी (दुनो बहिन बिआह कर ससुराल चल गई थी) को का दिक्कत हो सकता है! लेकिन मामला पर्सनल था, अऊर हम दूनो के बीच समय का दीवार भी आ गया था, त हम चुप लगा गए. लेकिन उसका घर में जाकर, उसका माँ बाप के सामने से, उसका सामान लेकर आना, हमको बहुते अजीब लग रहा था. मन नहीं मान रहा था.
हम राजू को समझाए, “ ठीक है! तुम अलग रह रहे हो, तुमरा अपना फैसला है. लेकिन घरे जाकर समनवा ले आने में का दिक्कत है?”
“हम अपना माँ बाप का सूरत नहीं देखना चाहते हैं. अगर तुम नहीं जाना चाहते हो त हम प्रदीप से बोल देते हैं.”
हम मना कर दिए. उस दिन के बाद ऊ अपना माँ बाप के साथ हमरा सूरत भी देखने से परहेज करने लगा. अऊर हम त उसका सूरत देखे भी नहीं उसके बाद.
दोस्त लोग से पता चला कि सायद नौकरी छोड़कर इधर उधर गजल का प्रोग्राम देते हैं राजू बाबू. उनके साढू, जो एक समय भरत के मसहूर गजल गायक में से एक थे अऊर फिल्मों में पार्श्व गायक थे, आज गजल का अध्याय खतम होने के साथ खुद खतम हो गए लगते हैं.
हमरे कान में अभी भी राजू का बात गूँजता है कि “हम अपना माँ बाप का सूरत नहीं देखना चाहते हैं” अऊर ई बात ऊ बोल रहा था जो अपना माँ बाप का चरन देखकर आँख खोलता था.

शुक्रवार, 28 मई 2010

दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार




आज हमरी एकलौती बेटी सुबहे से बहुत उदास है.
अभी पीछे जे हम पटना गए थे, त ऊ ऊहाँ हमरा बेटा (हमरा भाई का बेटा - हमरा संजुक्त परिवार में हम लोग भतीजा नहीं बोलते हैं) यानि अपना भाई से मिलकर बहुत खुस थी. बगले में हमरा भगिना अऊर भगिनी रहता है सब. एक जगह, एक साथ मिलकर सब बच्चा लोग बहुत खुस था.
एक दिन दोपहर में चारों बच्चा सब जोर से चिल्लाया त हम सब लोग डरा गए कि का हुआ. लेकिन तुरते समझ में आया कि ई एक्साइट्मेंट में चिल्लाया था सब. हुआ ई कि सब बईठ के एक साथे सिनेमा देख रहा था टीवी पर, त अचानके ऊपर से एगो गिलहरी का जलमाउत (नवजात) बच्चा ऊ लोग के बिछौना पर गिरा. पहिले त सब डरे चिल्लाया, फिर उसका माँ को खोजने इधर उधर गया. जऊन छज्जा से ऊ गिरा था ओहाँ चढकर देखने पर भी कोनो गिलहरी देखाई नहीं दिया.
जब उसका माँ नहीं मिला, त सब बच्चा ऊ गिलहरी का सेवा में लग गया. सबसे पहिले त उसका नाम धराया जेरी (टॉम जेरी वाला). एक बच्चा भाग के रूई का बंडल लेकर आया अऊर महादेवी जी के गिल्लू के जईसा उसको दूध पिलाने का इंतजाम करने लगा. दुसरा तुरत उसके लिए जूता के डिब्बा से उसका घर बनाया, अऊर उसको गर्मी से बचाने के लिए उसका घर में ठंडा हवा का इंतजाम कर दिया. तीसरा उसका बिछावन ले आया.
अभी बच्चा का आंखो नहीं खुला था. सारा दिन उसका सेवा हुआ. जेरी भी खूब आराम से सो गया. फैसला हुआ कि जेरी को हमरा भगिना अपने घर ले जाएगा, अऊर तय हुआ कि रोज हमरे घर ऊ उसको लेकर आएगा, अऊर सब लोग बारी बारी से उसका सेवा करेंगे.
पहिला दिन बीत गया, दोसरा तीसरा दिन से हमरी बेटी उसका फोटो खींचने अऊर विडियो बनाने में लग गई. काहे कि बेचारी को तो वापस चले आना था. ऊ सोच ली थी कि जेरी को हर तरह से कैमेरा में बंद करके लेते आएगी. आने वाला दिन जेरी भी सबके साथ हम लोग को इस्टेसन पर सी ऑफ करने आया.
यहाँ आकर भी रोज फोन से उसका हाल चाल पूछना अऊर हमको बताना कि आज उसका आँख खुल गया. अब ऊ अपने से दूध पी लेता है.
आज सुबह सुबह फोन आया हमरा बेटा का पटना से कि जेरी चल बसा, अचानक। कल रात ठीक ठाक था, सबेरे सब खतम. उधर हमरा बेटा पटना में उदास है, इधर हमरी बेटी दिल्ली में. निदा फाज़ली साहब के दोहा के हिसाब से ‘दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार’।

बुधवार, 26 मई 2010

हमरा पहिला कबिता !!


अचानक हमरे अंदर छिपा हुआ कबि जाग उठा, अऊर हमको लगा कि हम एही भासा में लिखें... लेकिन फिर लगा कि नहीं कबिता को कबिता रहने देते हैं, अऊर सब लोग के खातिर हिंदिये में लिखने का कोसिस किए हैं॥ आपलोग का आसिरवाद चाहिए...

भयाक्रांत मन पिशाच
क्यों रहा है नाच!!
जीवन के स्वर्णिम मुहाने पर
कैसा है झंझावात!!

चलो बादलों को हटा दो
हम अपना घर ढूंढ लेंगें कहीं
पत्तो को रोक लो पीला होने से
दहलीज़ पर कौन ठिठक कर बैठ गया
हाँक लो सारी गायें
चलो अब फिर जी जायें!

रविवार, 23 मई 2010

असर नहीं त पैसा वापिस!!!


एगो आदमी था। रिटायर होने के बाद एक दिन अचानक, बेचारा बहुते बीमार पड़ गया।
बिमारी भी अइसन-वइसन नहीं, सीरिअस !! सब टेस्ट ठीक-ठाक, कोनों रिपोर्ट गड़बड़ नहीं, लेकिन बाबू साहेब का हालत जो बिगड़ा, सुधरने का नामे नहीं ले रहा था. देखते देखते एकदम कमजोर देखाई देने लगे. लोग हैरान, डॉक्टर परेसान, बाकी बिमारी कोई नहीं धर पा रहा था. एक रोज एगो ऑफ़ीस का अदमी आया, उनको देखने के लिए. हालत देखकर बहुत घबरा गया. उनके सिरीमती जी को बगल वाला कमरा में ले जाकर कान में धीरे से एगो दवाई बताया.
उसके बाद त कमाले हो गया. एक हफ्ता के अंदर उ साहेब इतना तंदरुस्त हो गए कि लगा जइसे दोबारा नौकरी सुरू कर देंगे. सब लोग टोला-मोहल्ला का औरत उनका पत्नी से दवाई का नाम पूछने लगी. ऊहो बेचारी बहुते सीधी औरत थीं. बताइये दिहिन दवाई का नाम, अउर हमारा सिरीमती जी के मार्फ़त जो भेद हमको पता जला ऊ आप लोग को भी बताते हैं. समाज का काम आए ऊ दवाई, त इससे अच्छा का होगा.
दवाई दू तरह का है- पहिला है ‘तारीफ़’ अउर दोसरा ‘बुराई’. खोराकवा भी नोट कर लीजिए. सबेरे दू चम्मच मरीज का तारीफ़- नाश्ता के साथ, फिर खाना के बाद- किसी का बुराई का चार चम्मच अउर रात को खाना खाने के बाद फिर से दू चम्मच उनका तारीफ का पिलाते रहिये. दवाई का असर एक हफ्ता के अंदर देखाई देने लगेगा. कमाल त ई बात का है कि ई दवाई का कोनों साइड एफेक्ट नहीं है, अउर ओभरडोज का भी कोनों खतरा नहीं है.
केतना बार त ई दवाई आपको घर में, ऑफिस में लोग चुपचाप पिलाता रहता है, अउर आपको पतो नहीं चलता. एही से त ई दवाई पिलाने वाला को लोग चमचा कहने लगा. आदि काल से ई दवाई का परयोग भगवान अउर इंसान बराबर रूप से करते आ रहा है. ‘को नहीं जानत है जग में’ बोले बिना त ऊहो समुन्दर लांघने को तैयार नहीं हुए. कभी ध्यान से भजन का लाइन पर गौर कीजिएगा तो पता चलेगा कि सब ओही दवाई का पुड़िया है. अरे भाई जब ऊ परमपिता हैं, त उनको दवाई खिलाने का का जरुरत है. एगो सायर लिखे थे बहुत दिन पहले:
जानकार ये खुदा से कुछ न कहा
वो मेरा हाल जानता होगा.
लेकिन अब कोनों फायदा नहीं है, अब त ई दवइयो नशा बन गया है. अउर कोई भी अदमी ई नशा से अछूता नहीं है. एही ब्लोग्वे पर देखिये. बस ई पोस्टवा के बाद से, हर दस-दस मिनट पर देखने का मन करते रहता है कि का-का टिपिआया है लोग. जैसे जैसे नंबर बढ़ता जाता है, मन हरियर होता जाता है, अउर नमबरवा नहीं बढ़ा त बस तबियत खराब होने लगता है.
अब त आप ही लोग का आसरा है। बचा सकते हैं त बचा लीजिए. ज़िंदा रहेंगे त हमरी सिरीमती जी, आपको उनका सोहाग बचाने के लिए आसिरबाद देंगी, हमरी बचिया आपका एहसानमंद रहेगी, अउर हम आप लोगों का अइसहीं मनोगंजन... माफ कीजिए मनोरंजन करते रहेंगे. जय राम जी की!!

गुरुवार, 20 मई 2010

धन्यवाद!!

अब का बताएँ, इ पोस्टवा लिखला के बाद तुरते हमको पटना जाना पडेगा मालूमे नहीं था। और आप लोग का इतना प्यार मिलेगा इहो हम नहीं सोचे थे। सबसे पहले एक बार फिर सुमन जी से माफ़ी माँगते हैं की उनको हमारे कारण कोई तकलीफ उठाना पडा हो इसके लिए। काहे से कि कोई भी आदमी कोई व्रत लेता है तो उसको तोड़ना बहुते कठिन काम होता है। लेकिन हमको ख़ुशी है कि सुमन जी हमको इज्जत दिए और हमारे खातिर अपना व्रत तोड़ दिए।
आज एगो बात तो समझ में आइये गया है कि ईमान दारी का बहुते कदर है ज़माना में। हमको बिहारी का नाम से भी कुछ लोग इज्जत देता था, पहचानता था। लेकिन जब से हम अपना असली परिचय दिए तब से त हमारा इमानदारी के कारन भी लोग हमसे जुड़ गया है।
हम पटना में बैठ कर एकदम आदिम जुग में चले गए हैं। गर्मी चरम सीमा पे है, और बिजली नदारद। बस एकदम आदिम जुग का आदमी हो गए हैं। बस इ गर्मी में एक बतिया का ख्याल हमेशा आता है कि हमको तो घरवा में बैठकर भी गर्मी लगता है और हम एयर कंडीशन में आराम कर लेते हैं। का मालूम केतना मजूर रास्ता पर बोझा ढोता है, रिक्सा चलाता है और खेत में काम करता है।
चलिए आते हैं इतवार को तो जम के बतियाएंगे।

शनिवार, 15 मई 2010

N I C E

बचपन में एगो कहानी पढे थे, कि एगो राजा अपना मंत्री के साथ जंगल में सिकार खेलने जा रहा था. सिकार त नहीं मिला, राजा का कोनो तेज पत्थर स गोड़ कट गया. बेचारा राजा बहुते कस्ट में था. मंत्री पूछा, “का हुआ महाराज?”
राजा कस्ट से बोला, “अरे ! हमारा गोड़ कट गया है, अऊर एतना खून बह रहा है. तुमको देखाई नहीं देता है!”
मंत्री बोला, “NICE.”
अब त राजा का गुस्सा सातवाँ असमान पर पहुँच गया. गुस्सा में बोला, “ तुम अभी हमरा साथ छोड़कर चले जाओ, अऊर हमको कभी अपना मुँह मत देखाना.”
मंत्री बोला, “ NICE.” राजा को नमस्कार किया, अऊर चला गया.
अभी मंत्री गएबे किया था कि ओन्ने से जंगली लोग का झुंड आकर राजा को घेर लिया अऊर बोला कि ले चलो इसका बलि अपना देवी माँ को चढाएंगे. राजा परेसान. जब बलि देने का तैयारी पूरा हो गया त अचानक ऊ लोग देखा कि राजा का गोड़ कटा हुआ है. तब त बलि दूसित हो गया, ई सोचकर सब राजा को छोड़ दिया.
राजा जान बचाकर भागा त उसको मंत्री से भेंट हो गया. ऊ बोला, “ हमसे गलती हो गया भाई. चलो हम लोग महल चलते हैं. हमरे साथ त बहुत अनिस्ट होने से बच गया.”
मंत्री हँसकर बोला, “ एही से हम आपका गोड़ कटने पर NICE बोले थे.”
राजा पूछा, “ लेकिन जब तुमको हम निकाल दिए तबो तुम NICE काहे बोला ?”
मंत्री बोल, “ NICE इसलिए कि आपके साथे हम रहते त हमरा बलि पड़ गया होता.”

अब आप सोच रहे होंगे कि ई कहानी जे हर कोई पढा हुआ है, हम आपको काहे सुनाए. ऊ इसलिए कि आज का हमरा पोस्ट समर्पित है लोक संघर्ष के श्री सुमन को. हम त ई टी ट्वेंटी के नया खिलाड़ी हैं, एही से हमको मालूम नहीं कि कौन कारण से सुमन बाबू ई नाईस व्रत लिए बैठे हैं. लेकिन एक बात जो हमको समझ में आया है कि ऊ कानून के जानकार आदमी हैं, इसलिए ओही मंत्री का जैसा सोचते हैं.
पहिला बात, ई सराहना करना होगा कि ऊ कम से कम सभे पोस्टको देखते हैं. अऊर झुठो का बात लिखने से अच्छा ई समझते हैं कि नाईस लिख दें.
दुसरा बात, ई बाइनरी डिजिट्स का जमाना है. ‘जीरो’ चाहे ‘एक’. इनका भी एही सोचना होगा कि अच्छा लगेगा पोस्ट त नाईस लिखेंगे नहीं त बिना कमेंट दिए चले जाएंगे. बीच का त बतवे बनावटी है. असली चीज है NICE.बाकी सब बकवास..किलियर है!
तीसरा बात, कुछ लोग इनका ऊपर ई भी इल्जाम लगाया कि ऊ सीरिअस पोस्ट, चाहे दुःख का बात वाला पोस्ट पर भी NICE लिख देते हैं. ईहाँ पर NICE से उनका मतलब लिखने वाला का एक्स्प्रेसन अऊर कंटेंट से है.
चलिए ई त हमरा अनुमान है कि ऐसा नहीं त वैसा हुआ होगा. असली भेद त पता चलेगा ‘फ्रॉम हॉर्सेस माउथ’. अऊर उसके लिए हम सबको इंतज़ार करना पड़ेगा सुमन जी का NICE व्रत टूटने का.
आखिर में एगो अऊर कहानी बोलने दीजिए. एगो आदमी दिल्ली समझ कर इलाहाबाद में उतर गया अऊर सारा दिन लाल किला खोजते रहा. साँझ को एगो आदमी से पूछा कि भाई साहेब लाल किला कहाँ है, बताइएगा. जवाब में ऊ आदमी उल्टे पूछा, “ कब आए हो?” बेचारा नरभसा के बोला, “ आज सबेरे आए हैं.” बड़ा ठठा कर हँसा ऊ आदमी, अऊर बोला, “ हम एक महीना से कुतुब मिनार खोज रहे हैं मिलबे नहीं किया है. तुमको एक्के दिन में लाल किला देखना है.”
सहिए बात है, हम अभी जुमा जुमा आठ गो पोस्ट भी नहीं लिखे हैं अऊर चले हैं सुमन जी का NICE का अर्थ खोजने, जबकि बड़ा बड़ा टेस्ट प्लेयर लोग हार गया है. सुमन जी अब भेद खोलिए दीजिए. बहुत लोग आस लगाए है.

गुरुवार, 13 मई 2010

खुबसूरत अंधबिस्वास

जमाना चाहे केतना भी एड्भांस हो जाए, अंधबिस्वास खतम नहीं होता है. अऊर अंधबिस्वास भी अजीब अजीब तरह का पालता है लोग जिसका कोनो सिर पैर नहीं होता है. अब बताइए कि दही खाकर काम करने से ऊ काम सफल होता है, त सफलता में दही का हाथ है कि अदमी के मेहनत का! करिया बिलाई रस्ता काट दे त काम बिगड़ जाता है. अऊर कहीं बिलाइये का एक्सीडेण्ट हो जाए त कौन दोसी. घर से निकलते कोई छींक दिया त काम खराब. अऊर काम अच्छा हो गया तब?
अब केतना गिनाया जाए. जेतना समाज, ओतना अंधबिस्वास. कहाँ से सुरू हुआ, अऊर कब से चला आ रहा है ई सब, कोई नहीं जानता है. अब देखिए न, हम जोन अपार्टमेंट में रहते हैं, उसमें फ्लैट नं. 420 का नम्बर मिटा के भाई लोग 421 बना दिया है. अब सोचिए त, नम्बर 420 होने से कहीं अदमी दू नम्बरी हो जाता है का ? बाकी मन का भरम का कोनो ईलाज नहीं.
नम्बर से एगो अऊर बात याद आ गया. होस्पिटल में कभी देखे हैं 13 नम्बर बेड नहीं होता है. अरे भाई तेरह नम्बर का पावर एतना तगड़ा हो गया कि डाक्टर का काबलियत भी हार जाता है! कमाल है!! अब इम्तेहान में रोल नम्बर 13 हो गया,त पढाइए छोड़ कर बईठ थोड़े जाता है अदमी.
अब एगो मजेदार बात बताते हैं..सायद बहुत सा लोग को मालूम होगा. बाकी जो लोग नहीं जानता है उनको बताते हैं. चंडीगढ शहर में बहुत सेक्टर है, लेकिन 13 नम्बर सेक्टर नहीं है. इहो अंधबिस्वास का नतीजा है. लेकिन इसमें भी खूब सुंदर अंधबिस्वास छिपा है. जेतना सेक्टर है, उसका नम्बर एतना हिसाब से बइठाया हुआ है कि आप कोनो आमने सामने वाला दूगो सेक्टर का नम्बर जोड़िए त ऊ 13 का गुणक होगा. जैसे 44 सेक्टर का सामने 34 सेक्टर, दुनो का जोड़ हुआ 44+34=78 और 78= 13X6.
अब ई सब सेक्टर के नम्बर पर लागू होता है. केतना खूबसूरत गणित है...चाहे खूबसूरत अंधबिस्वास. 13 नम्बर सेक्टर नहीं है, मगर सभे सेक्टर के बीच मौजूद है.