बुधवार, 26 सितंबर 2012

मैं हूँ ना!!

हे भगवान! इस चप्पल को इसी समय टूटना था! अभी कितने काम पड़े हैं और आस-पास कोई मोची भी नहीं.
मैं हूँ ना! बोलो क्या करना है, चप्पल मरम्मत करवा दूँ या नई दिलवा दूँ?
तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे अलादीन का जिन्न तुम्हारा हुक्म बजा लाने को तैयार हो!
बन्दा किसी जिन्न से कम है क्या! वो देखो सामने चप्पलों की दुकान है. चलकर नयी ले लेते हैं ना!
सुनील! प्लीज़ तुम तो रहने ही दो, मैं ले लूंगी.
कहती हुई अंजना बाटा की दुकान में दाखिल हो गयी और अपने लिये चप्पल पसन्द करने लगी. एक चप्पल उसे पसन्द आई, थोड़ी ऊँची हील की अच्छी चप्पल थी. उसने चप्पल पैरों में डाली और सामने लगे आईने में देखने लगी. पैरों से नज़र हटी भी नहीं थी कि उसने देखा, आईने में सुनील नाक सिकोड़े उसके पीछे ही खड़ा था.
तुम यहाँ भी चले आए, मेरे पीछे-पीछे. मुझे पता था कि तुम्हें ये हील पसन्द नहीं आयेगी.
.....
ओफ्फोह बाबा! अब ये अपनी नाक सिकोड़ना बन्द करो. मैं वो वाली ले लेती हूँ... और सुनो, अभी मेरे पास पैसे हैं, इसलिये तुम्हें पेमेण्ट करने की ज़रूरत नहीं.
अंजना ने टूटी चप्पल डिब्बे में बन्द करवाई और नई चप्पल पहनकर दुकान से बाहर निकल गई.

सुनील के पागलपन की ये इन्तिहाँ थी कि वो साये की तरह अंजना के साथ लगा रहता था. अब चाहे खुशी चाहे ग़म, हमेशा उसके साथ. अंजना भी याद करती थी वे दिन, जब सुनील की पोस्टिंग कोलकाता में थी. उसके बग़ैर लगता था कि वो एक कदम नहीं बढा सकती. ख़ुद को कितना बेसहारा महसूस करती थी. इतनी बड़ी दुनिया में ऐसा लगता था कि जैसे वो खो जायेगी. तब तो कई मौकों पर वो महसूस करती कि काश अभी सुनील यहाँ होता तो मेरा ये काम कितनी आसानी से हो गया होता.

और उसके उलट आज तो ये हाल है कि वो साये की तरह अंजना के पीछे रहता है. न नौकरी है उसके पास, न कोई काम. बस सारे दिन अंजना के साथ लगा रहता है. अभी उसी रोज़ की तो बात है. डॉक्टर ने मना किया था अंजना को ठण्डी चीज़ें खाने से. फिर भी बाज़ार में उसने आइसक्रीम ख़रीदी और बस एक स्कूप मुँह में डाला ही था कि न जाने कहाँ से सुनील उसके सामने आकर खड़ा हो गया और लगभग चीख़ते हुये बोला, पकड़ लिया! अभी टौंसिल का दर्द गया नहीं और तुमने आइसक्रीम खाना शुरू कर दिया! तुमने क्या सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा!

सुनील ने यह बात इतनी ज़ोर से और अचानक कही कि अंजना के हाथ से आइसक्रीम का प्याला गिरते-गिरते बचा. उसने गुस्से और खीझ से भरकर जवाब दिया, मेरा दर्द ख़तम हो गया है तभी तो खा रही हूँ और डॉक्टर के कहने से क्या होता है. दो चम्मच आइसक्रीम खाने से मैं मर नहीं जाउंगी!
ठीक है! मैं बेकार ही तुम्हारे और आइसक्रीम के बीच आया. खा लो. कहो तो एक बड़ा सा बटर-स्कॉच और मंगवा दूँ. तुम्हारा फेवरिट फ्लेवर!!
अब ताने मत मारो. लो मैं नहीं खाती.

और जब तक सुनील कुछ जवाब देता, उसने पूरा कप गार्बेज-बिन में डाल दिया. आस-पास खड़े लोग अजीब सी नज़रों से उसे देख रहे थे, मगर तब तक वो दुकान से निकल गयी.
घर लौटते समय, उसने बिजली की दुकान से बल्ब खरीदा.
ये बल्ब क्यों ख़रीद रही हो तुम?
आज रात आलू-बल्ब की सब्जी बनाऊँगी.... बालकनी का बल्ब फ्यूज़ हो रखा है चार दिन से. स्ट्रीट लाइट की रोशनी से कब तक काम चलाऊँ. वहाँ बैठकर पढाई भी नहीं कर पाती.”
“अरे हाँ! मैं भी जब तुम्हें दूर से देखने की कोशिश करता हूँ तो तुम्हारा चेहरा साफ़ नज़र नहीं आता. सी.एफ.एल. ले लो ना, बिजली भी बचाए और चेहरा साफ़ नज़र आये!”
“अगली बार!”

अंजना घर के दरवाज़े तक पहुँच गयी. उसने कंधे की ओट से सुनील को देखा और ‘बाय’ कहकर अंदर चली गयी. उसे लगा सुनील उसे देख रहा होगा छिपकर, इसलिए सबसे पहले वह बालकनी में बल्ब लगाने लगी. ऊंचे वाले स्टूल को उसने होल्डर के नीचे फर्श पर रखा और संभलकर स्टूल पर चढ़ गयी. पंजे उचकाकर जैसे ही वो बल्ब होल्डर में लगाने लगी कि उसका बैलेंस बिगड गया, उसकी साँस रुक गयी और धडाम से ज़मीन पर गिरने ही वाली थी कि सुनील की बाहों ने उसे थाम लिया.

“तुम्हें क्या लगा था कि मैं दरवाज़े से लौट गया. मैं तुम्हारे पीछे-पीछे दबे पाँव अंदर आ गया था, मुझे पता था कि तुम फिसलने वाली हो. और मैं तुम्हें कैसे गिरने देता!”
“ओह सुनील! तुम्हें गुज़रे, कितने साल हो गए. अब तो मैंने हिसाब रखना भी बंद कर दिया. तुम्हारे दोनों बच्चों को बड़ा करना, उन्हें पढ़ा लिखाकर उनके पैरों पर खडा होने के काबिल बनाना, उनकी शादी, उनका घर बसाना... और अब अकेले कितने काम करने पड़ते हैं मुझे.”
“मैं जानता हूँ, देखता जो रहता हूँ तुम्हें. तुम्हारे साथ-साथ, तुम्हारे पीछे-पीछे!”
“लोग कहते हैं कि अंजना इतनी हिम्मत कैसे जुटा लेती है तू. अकेली औरत और इतनी बड़ी दुनिया... तुम्हें पता है, कहाँ से जुटाती हूँ मैं ये हौसला और हिम्मत?”
“कहाँ से!”
“तुमसे... जब तुम कोलकाता में थे, तब मुझे लगता था कि मैं अकेली हूँ, तुम नहीं मेरे साथ. लेकिन अब तो लगता है कि मैं एक मिनट को भी अकेली नहीं.”
“कभी डर नहीं लगता तुम्हें!”
नहीं. डर लगते ही कानों में तुम्हारी आवाज़ गूंजने लगती है. मैं हूँ ना!”

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(यह लघु-कथा लिखने का मेरा प्रथम प्रयास है. इसकी घटनाएँ तथा पात्र परमात्मा की नहीं मेरी रचना हैं. अगर किसी से मेल हो तो इसे ऊपरवाले के स्क्रिप्ट की कार्बन कॉपी न मानकर महज इत्तेफाक समझें)

बुधवार, 29 अगस्त 2012

निंदक, बिगाड़, ईमान और कबीर


हमलोग जब छोटा थे तब का समय अऊर आज का समय मेँ जमीन-आसमान का फरक हो गया है. पढाई-लिखाई का सिस्टम भी बदल गया है. जहाँ एक तरफ हिन्दी के किताब मेँ नज़ीर अकबराबादी का मस्नवी पढाया जा रहा है, ओहीँ दोसरा तरफ कबीर अऊर कबीर का दोहा भी. अज्ञेय का कबिता भी अऊर कैफी आज़मी का गीत भी. देखकर बहुत खुसी भी होता है कि आज के बच्चा लोग को साहित्त माने साहित्त पढा रहे हैँ, अब ऊ चाहे हिन्दी भासा का साहित्त हो चाहे उर्दू/हिन्दुस्तानी भासा मेँ लिखा जाने वाला साहित्त. मगर दु:ख भी होता है, जब देखते हैँ कि अपना बच्चा लोग को न सायरी मेँ दिलचस्पी है, न दोहा मेँ; न कबिता मेँ, न ग़ज़ल मेँ.

एक रोज बेटी हिन्दी का किताब लेकर आई कि कबीर का दोहा समझा दीजिये. हम बोले कि पढो जोर से कौन सा दोहा है. ऊ पढना सुरू की:
निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाये,
बिन साबुन पानी बिना, निरमल करे सुभाये!
हम उसको अर्थ बताये – जो व्यक्ति तुम्हारी आलोचना या बुराई करता है उसको हमेशा अपने  पास रखना चाहिये. हो सके तो उसे अपने घर के आँगन मेँ एक कुटिया बनाकर रहने की जगह दे दो. क्योँकि ऐसे व्यक्ति तुम्हेँ तुम्हारे दोषोँ से परिचित कराते हैँ और इसी बहाने तुम्हेँ उसे सुधारने का अवसर प्रदान करते हैँ. वास्तव मेँ वे लोग बिना साबुन और पानी के ही तुम्हेँ निर्मल करते हैँ. क्योँकि साबुन और पानी से तो केवल शरीर की गन्दगी को साफ होती है, ये आलोचक तुम्हारे अंतर्मन को निर्मल करते हैँ.
बेटी बहुत गौर से हमारा बात सुनती रही. बोली, डैडी! जब आप हिन्दी मेँ कविता या दोहे का अर्थ बताते हैँ तो मुझे सुनने मेँ बहुत अच्छा लगता है. ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक सीरियल का डायलॉग बोल रहे हैँ! हम अकबका गये कि बेटी के इस बात को कॉम्प्लिमेण्ट समझेँ कि का समझेँ. मगर जब ऊ अपना तरफ से दोहा का ‘एक्स्प्लेनेशन’ दी, तब हमको कुच्छो कहते नहीँ बना. ऊ बोली, ये तो गलत बात है डैडी! अगर उसको अप्ने आँगन मेँ कुटिया बनाकर रहने देंगे, तब तो वो आलसी हो जायेगा और इसको आपका एहसान मानेगा. एहसान से दबने के बाद तो वो खुद ही निन्दा करना भूल जायेगा.

जेतना तर्कजुक्त तरीका से अऊर सीरियसली ऊ हमसे कही ई बात, हम एकदम अबाक रह गये अऊर तत्काल कोनो जवाब हमको नहीँ सूझा. बस एतने कहे कि ई सब बात इम्तिहान मेँ मत लिख देना, नहीँ त जीरो मिलेगा. जेतना समझाये हैँ, ओतने लिखो.

चैतन्य बाबू को फोन पर बताए ई बात. पहिले त ऊ हंसे, ई बात सुनकर, बाद मेँ राजनैतिक बिसय पर अपना एक्स्पर्ट कमेण्ट देने के इस्टाइल मेँ बोले, आप नहीँ समझते हैँ सलिल भाई, मगर बेटी ने बहुत मार्के की बात की है. सच पूछिये तो यही बात मैँ कब से कह्ता आ रहा हूँ. ये प्रिण्ट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया, व्यवस्था के साथ मिलकर यही तो कर रहे हैँ. हमने तो इस विषय पर कितनी पोस्ट लिखी है.
हम बोले. आप तो हर बात का पॉलिटिकल मतलब निकालने लगते हैँ.
नहीँ सर! ये बात तो बिटिया ने कह दी, जो आप नहीँ मानना चाहते. एक ज़माना था जब कहावत मशहूर थी कि जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो. तब ये मीडिया निन्दक का काम किया करते थे. लोग घबराते थे. आज हालात बदल गये हैँ. व्यवस्था ने तमाम निन्दकोँ यानि मीडिया घरोँ को घर दे दिये, अपने आंगन मेँ कुटिया छवाकर बिठा लिया. अब जैसा बिटिया ने कहा, सारे निन्दक आलसी हो गये हैँ, उन्हेँ व्यवस्था के दोष दिखाई ही नहीँ देते और धीरे-धीरे वे निन्दक से चाटुकारोँ की श्रेणी मेँ आ गये हैँ. रोटियोँ और बोटियोँ के एवज़ मेँ सच्ची निन्दा के स्थान पर, झूठी प्रशंसा के पुल बनवा लो उनसे.
चैतन्य भाई! आज इस मुद्दे पर दूसरी बार निरुत्तर हुआ हूँ. पहले बेटी ने किया और अब आपने. लगता है पुराने सन्दर्भोँ को दुबारा देखने परखने की ज़रूरत है.
सर जी! सिर्फ मीडिया ही नहीं समाज में हर तरफ यही दिखाई दे रहा है. वे बातेँ और मर्यादाएँ कब की खण्डित हो चुकी हैँ. और मैँ तो डायलॉग नहीँ बोलता आपकी तरह, फिर भी कहता हूँ कि खण्डित प्रतिमाएँ म्यूज़ियम मेँ तो रखी जा सकती हैँ, ड्राइंग रूम मेँ नहीँ सजायी जा सकती.

कबीर के दोहा का ऐसा भावार्थ सुनकर हमरा त माथा घूम गया. याद आ गया एगो अऊर कहानीकार का बात. का मालूम का नाम था उसका, लोग कह्ता था कि ऊ खेत का मेँड पर बइठकर कहानी लिखता था. जहाँ बइठकर दतवन किया जाता है वहाँ बइठकर कहानी लिखने से एही खराबी होता है. सुनिये ऊ कहानीकार का बात, अब त हमको भी फिजूल का बात लगता है. कहीँ पढे थे कि बिगाड के डर से ईमान की बात नहीँ कहोगे.

हम होते त जवाब देते कि ई त डिपेण्ड करता है कि बिगाड किससे मोल लेना है अऊर ईमान का बात किसके फेभर मेँ बोलना है!!

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

तुझपे दिल कुर्बान!!


सुक्रबार के रोज मुसलमान लोग नमाज पढ़ने मस्जिद में जाता है. लेकिन ओही रोज हमलोग पूरा परिबार के साथ मंदिर जाते थे. जुमा के रोज नमाज पढ़ने का त एक ज़माना से परम्परा चला आ रहा है, बाक़ी सुक्रबार को हमरा मंदिर जाना संजोग का बात नहीं था. असल पूरा सहर सुक्रबार को मंदिर जाता था. मंदिर में दरसन करने के लिए एक किलोमीटर लंबा लाइन लगा रहता था अउर दरसन करने में टाइम भी लगता था. जइसे मंगल को बजरंगबली के मंदिर में होता है एकदम ओइसने. मगर ई मंदिर भी संतोषी माता का नहीं था. राधाकिसन, दुर्गा जी, महादेव बाबा अऊर गुरुद्वारा में गुरुग्रंथ साहिब भी थे. समुंदर के किनारे ऊ मंदिर अऊर मंदिर के सामने एगो मस्जिद. सुक्रबार का दिन त हम बताइये दिए हैं. सो बस मेला का दिरिस रहता था.

ओह सौरी!! ई बताना त हम भुलाइये गए कि ई मंदिर दुबई के बर-दुबई इलाका में था अऊर सुक्रबार के दिन साप्ताहिक छुट्टी रहता था ओहाँ, एही से ओही दिन लोग मंदिर जाता था. हमलोग शारजाह में रहते थे. सिरीमती जी के आदेस के अनुसार, भोरे-भोरे उठकर नहाधोकर सबलोग तैयार हो जाते थे. नास्ता-पानी कुछ नहीं, जबतक मंदिर में पूजा नहीं कर लें, तब-तक हमलोग का उपवास. पूजा के बाद, परसादी खाकर पानी पीना, उसके बाड़े कोनो रेस्त्राँ में जाकर नास्ता पानी.

घर से टैक्सी में जाना होता था अऊर जाने में भी करीब पौना घंटा का टाइम लगिये जाता था. ओहाँ जादातर टैक्सी चलाने वाला अफगानिस्तान का पठान सब है. भर रास्ता टैक्सी में चाहे कोनो पख्तूनी गाना बजाते रहता था, नहीं त कोनो कुरआन सरीफ का पाठ चलता रहता था. पख्तूनी गाना समझ में भले नहीं आता था, लेकिन संगीत सुनकर मन खुस हो जाता था, लगता जइसे अपने देस का संगीत सुन रहे हैं. ओहाँ सिनेमा हॉल में भी हिन्दी सिनेमा देखने बहुत सा अरबी लोग आता था. हमरा एगो साथी बताया कि सिनेमा त ऊ लोग ‘सब-टाईटिल’ देखकर समझता है, मगर असली मजा ऊ लोग को हिन्दुस्तानी गाना अऊर संगीत में आता है. बाद में एक रोज सिनेमा हॉल में बहुत भीड़ नहीं था, त हमलोग देखे एगो अरबी अपने हाथ में पारंपरिक अरबी छाता नुमा छड़ी (जो गडरिया लोग लिए रहता है और ईसा मसीह के हाथ में देखाई देता है) लिए हुए सीट के बीच वाला रास्ता में नाच रहा है, पूरा लय अऊर ताल के साथ.

खैर, हम बता रहे थे मंदिर जाने के बारे में. ऊ दिन भी सुक्रबार था अऊर सबेरे ठीक सात बजे हमलोग टैक्सी में बैठकर बर-दुबई जाने के लिए निकले. टैक्सी ड्राइवर एगो दाढी वाला पठान था. सलवार कमीज पहने हुए, आँख में सुरमा लगाए हुए, आधा मेंहदी वाला लाल अऊर आधा काला लंबा दाढी, माथा पर गोल जालीदार उजाला टोपी पहने हुए. टैक्सी जैसहीं अल-जज़ीरा पार्क से आगे निकला, दुनो तरफ समंदर के रेत वाला इलाका चालू हो गया.

ऊ पठान अपना इस्टीरियो पर गाना बदला. गाना बदलते ही टैक्सी के अंदर दिलरुबा का सुर फैल गया अऊर हमको लगा कि एतना मधुर संगीत हम सच्चो कभी नहीं सुने थे. गाना का लाइन बुझा नहीं रहा था, मगर लगा कि कोई बहुत दर्द भरा गाना है या कोनो आदमी किसी को याद कर रहा है. खाली संगीत से हम एतना अंदाजा लगा लिए, इसी से आप समझिए कि ऊ संगीत में केतना गजब का अभिब्यक्ति रहा होगा.

हम देखे कि ऊ टैक्सी का आइना एडजस्ट किया अऊर अचानके पीछे घूम कर देखा. फिर गाड़ी चलाने लगा. मगर ऊ रह-रहकर पीछे देखता जा रहा था. अंत में हमको लगा कि कहीं एक्सीडेंट न हो जाए त हम बोले, “आप सामने देखकर गाड़ी क्यों नहीं चला रहे हैं! बार-बार पीछे क्यों देख रहे हैं? कुछ बात है क्या, तो हम दूसरी टैक्सी ले लेते हैं!”

ऊ पठान गाड़ी किनारे खडा कर दिया अऊर जब पीछे घूमा त हम देखे कि उसका आँख से आंसू बह रहा है. हम त एकदम अचकचा गए कि ई का हुआ. हमरे बोलने के पहिलहीं ऊ बोलने लगा, “भाई जान! आपकी बच्ची को देख रहा था बार-बार. हमारी बच्ची भी इतना बड़ा होती, जब उसको मुलुक में छोडकर हम आया. दस साल हो गया भाई जान, उसका शकल तक नहीं देखा. आज आपका बच्ची को देखकर अपना बच्ची याद आ गया.”
एतना कहकर अपना सीट के पीछे से ऊ एगो छोटा सा बच्ची का फोटो निकाल कर देखाया. “ये देखो भाई जान, मेरा बच्ची, जब हम उसको छोडकर आया. है ना आपका बच्ची का जैसा हू-ब-हू. पहला बार देखा है अपना बच्ची का शकल आपका बच्ची में!”
पता नहीं ऊ फोटो वाली बच्ची हमरी बेटी के जैसा थी कि नहीं, मगर बेटी त थी. उसके टैक्सी में बैठने वाली हमरी बेटी पहिला बच्ची त नहिंये होगी, मगर उसको का मालूम काहे अइसा लगा.

उसके बाद ऊ टैक्सी चलाता रहा, मगर हमरे आँख के सामने गुरुदेव रबिन्द्र नाथ ठाकुर का कहानी “काबुलीवाला”, बलराज साहनी का चेहरा, सलिल चौधुरी का संगीत और प्रेम धवन साहब का गीत.. सब एक साथ गुज़र गया. टैक्सी में काबुली धुन बज रहा था और गाना का बोल जो हमरे कान में गूँज रहा था, ऊ सायद अलग था उससे
माँ का दिल बनके कभी सीने से लग जाता है तू
और कभी नन्हीं सी बेटी बन के याद आता है तू
जितना याद आता है मुझको
उतना तड़पाता है तू
तुझ पे दिल क़ुरबान!!

सोमवार, 6 अगस्त 2012

कितना देती है??


जगह पटना का कोनो मेन रोड:

बताइये त तनी, बोलेरो, सुमो, जाइलो, सफारी, टवेरा, स्कोर्पियो, क्वालिस.. ई सब नाम सुनकर आपके मन में सबसे पहले का बात आता है. एही कि ई सब बडका गाड़ी का नाम है एस.यू.भी. बोलते हैं ई सब गाड़ी को. अऊर हो सकता है कि आपके दिमाग में हमरा भतीजा अभिषेक का भी नाम आ जाए, जो गाड़ी के बारे में अपना ब्लॉग पर लिखता है. मगर जब हम पटना का बात कर रहे हैं त ई सब नाम का माने कोनो गाड़ी का नाम भर नहीं है. ई सुमो, बोलेरो, स्कोर्पियो आपके लिए टाटा अऊर महिन्द्रा का गाड़ी होगा, मगर जब इसके साथ पटना का नाम जुट जाता है त ई गाड़ी नहीं कुछ अऊर बन जाता है.

पटना का कोनो सड़क पर निकल जाइए, एक त सड़क बहुत चौड़ा नहीं है अऊर दोसरा बिकास के अंतर्गत ऊ सड़क को भी आधा-आधी बाँट दिया गया है आने-जाने वाला के लिए अलग अलग लेन बनाकर. माने सड़क अऊर संकरा हो गया है. एही आधा सड़क पर दनदनाते हुए आपको हर दोसरा गाड़ी एही बडका वाला देखाई देगा. ऊहो एतना जोर से लगातार होर्न बजाते हुए कि मोटरसाइकिल वाला आदमी अगर हमरा जइसा कमजोर करेजा वाला हो त ओहीं रोडे पर गिर जाए.

तब्बे हम कह रहे हैं कि पटना में आझो सुमो, सफारी, बोलेरो अऊर क्वालिस का माने खाली गाड़ी नहीं होता है, इसका मतलब होता है एगो एलान कि हमरा औकात देख लीजिए, हमारा ताकत का अंदाजा लगा लीजिए अऊर समझ जाइए कि हमरे अंदर का सामंती ठाठ अभियो बरकरार है. अऊर ई सब के पीछे एलान एही कि हमरे खातिर रस्तवा खाली कर दिया जाए. जउन रास्ता पर मामूली वैगन-आर मोसकिल से चलता है उसपर बोलेरो लेकर होर्न बजाते हुए निकलना ही असली सक्ति-प्रदर्सन है. बड़ा आदमी होने का लच्छन.

जगह: नोएडा, सेक्टर २६, हमरे अपार्टमेंट के सामने का कोठी:

कोठी के दरवाजा पर सरकारी जमीन पर एगो रोवर गाड़ी, एगो नैनो अऊर दू गो फोर्ड अऊर होंडा सिटी गाड़ी लगा रहता है. सबेरे कभी बेटी को बस स्टॉप तक छोड़ने जाने के टाइम में घर की मलकिनी अपना पोती को ओही स्टॉप पर जहाँ सब लोग पैदल जाता है, रोवर से छोडने जाती हैं अऊर छुट्टी के टाइम पर नैनो से वापस लाने. दस बजे मालिक रोवर से ऑफिस चले जाते हैं कनॉट प्लेस, होंडा से बेटा जाता है कनॉट प्लेस और फोर्ड से बेटी जाती है ओही कनॉट प्लेस. घर में नैनो रहता है माता जी के लिए, ओही माता जी जो भोर में रोवर से बच्चा को छोड़ने जाती हैं.

समझे में नहीं आता है कि इहाँ भी होंडा अऊर फोर्ड या नैनो अऊर रोवर, गाड़ी का नाम है कि रुतबा का सर्टिफिकेट. अऊर कमाल ई कि पेट्रोल का दाम बढ़ने पर एही लोग सरकार के गलत फैसला का दुहाई देता फिरता है.

जगह: भावनगर, गुजरात:

छोटा सहर है, दिल्ली/नोएडा से त कोनो तुलना करने का बाते नहीं है, मगर जिला मुख्यालय है अऊर पटना से तुलना किया जा सकता. आइये इहाँ भी कुछ नाम सुनाते हैं आपको. स्कूटी, एक्सेंट, लूना (भुला गए होंगे ई नाम त इयाद कर लीजिए) वगैरह. बच्चा से लेकर बच्चा के दादा-दादी अऊर नाना-नानी तक, मजदूर से लेकर साहेब तक. अइसा नहीं है कि इहाँ ऊ सब गाड़ी का नाम कोई नहीं जानता है. हमरे घर के सामने एगो जिम है, ओहाँ भोरे-भोरे देखाई देता है, रिट्ज, स्विफ्ट, डिजायर. मगर सान का सवारी है स्कूटी नहीं त बाइक. इस्कूल जाने वाले बच्चा से लेकर (हमको त संदेह है कि कोनो बच्चा के पास लाइसेंस होता होगा) हमरे जइसा साहेब तक. अऊर मजेदार बात ई है कि कोनो दुपहिया के ऊपर चार-गो से कम सवारी नज़रे नहीं आता है. पूरा परिवार दुपहिया पर लादे, ई बात से बेखबर कि फालतू का सक्ति-प्रदर्सन किसके लिए या जबरदस्ती का स्टेटस काहे के वास्ते. जब बूढ़ी से बूढ़ी औरत को हम स्कूटी चलाते देखे त मन श्रद्धा से झुक गया.

सोचने लगे कि जब पेट्रोल का दाम बढ़ा त पूरा फेसबुक पर आग लग गया. फेसबुक में लॉग-इन करते के साथ पेट्रोल का गंध से नाक भर जाता था. मगर हमको लगता है कि इहाँ भावनगर में ऊ टाइम पर भी कोनो लड़का अपना दोस्त के बाइक पर प्यार से हाथ फेरते हुए कोनो गाड़ी के बारे में सबसे जरूरी सवाल पूछ रहा होगा – कितना देती है?

मंगलवार, 29 मई 2012

अब तो सचमुच चला बिहारी!!


एगो बहुत मसहूर कहावत है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है. लेकिन तेरह साल का टाइम कोनो एतना बड़ा टाइम नहीं है कि उसको इतिहास जईसा कहा जाए. फिर भी जो हुआ ऊ एकदम हू-ब-हू दोहराने वाला खिस्सा हो गया. आस्चर्ज त नहिंये हुआ उसपर, अफ़सोस बहुत हुआ. मन को समझा लिए कि ओशो कहते हैं कि दुःख को पलट कर देखियेगा त उसमें खुसी देखाई देगा. जादातर आदमी पलट कर नहीं देखता है एही से दुःख, दुःख मालूम पड़ता है.

तेरह साल पहिले कलकत्ता में एगो अस्टाफ के बिआह में हमारा पूरा ऑफिस गया हुआ था. हमरे बॉस भी थे. ग्रुप में एन्ने-ओन्ने का बात चल रहा था. अच्छा बात एही था कि ऑफिस का बात कोई नहीं बतिया रहा था. बात होने लगा रेलगाड़ी में सफर करने का अऊर ओही में बात निकल आया गाड़ी के डिब्बा में सामान चोरी होने का. हमरे बॉस के पास भी एगो अनुभव था जब उनका गया जंक्सन इस्टेसन पर कोई सामान चोरा लिया. ई दुर्घटना सुनाने के बाद ऊ जो कन्क्लूजन बताए ऊ तनी डायलॉग में सुनिए.
“अरे, आपलोगों को क्या पता, बिहारी चोर होते हैं!”
“नहीं सर! रेलवे स्टेशन की चोरियों का नेचर पूरे देश में एक जैसा होता है!”
“आप तो बोलेंगे ही वर्मा जी! मगर जो कहिये, सारे बिहारी चोर होते हैं!”
पहिले “बिहारी चोर” अऊर बाद में “सारे बिहारी चोर” सुनकर त हमरे देह में आग लग गया. हम भी आव देखे न ताव अऊर बिना आगा-पीछा सोचे तड़ से बोल दिए, “मगर इंटरनेशनल क्रिमिनल्स की लिस्ट में अगर भारत के टॉप टेन क्रिमिनल्स का नाम देखा जाए तो उनमें पाँच आपके अंचल के हैं, कहिये तो नाम गिनाऊँ! और संजोग से उसमें बिहारी कोई नहीं!”
माहौल अचानक सीरियस हो गया.

आगे बताने का जरूरत नहीं होना चाहिए कि हमारा ट्रांसफर ऑर्डर दू-चार दिन में हमरे सामने आ गया. ऊ समय पिताजी का तबियत बहुत खराब था. ट्रांसफर रोकवाने का बहुत कोसिस किये. जेतना लोग हमको जानता था, हमारा काम सराहता था, सबको बोले. सबलोग बोला कि कोई मोसकिल काम नहीं है, मगर अफ़सोस लौटकर खुसखबरी सुनाने कोई नहीं आया. खुसखबरी का, ईहो कहने कोई नहीं आया कि सौरी हम आपका मदद नहीं कर सके! हमरे साथ हुए सोलह लोग के ट्रांसफर में से पन्द्रह लोग को मन मुताबिक़ पोस्टिंग मिल गया, बस हमको छोडकर!  बिहारी जो ठहरे!

आखिरी उम्मीद था हमरे पुराने बॉस श्री माधव राव पर. मुम्बई में उनको फोन लगाकर बताए अपना मजबूरी अऊर बोले कि ‘हाँ’ या ‘ना’ जो भी हमको बता दें ताकि हम झूठा उम्मीद पर नहीं रहें. दू दिन बाद उनका फोन आया. आझो उनका बात हमरे कान में गूंजता है.
“सौरी, वर्मा जी! आई कान्ट हेल्प यू आउट!! लेकिन बड़े होने के नाते एक बात कहूँगा कि परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध मत जाइए. हो सकता है उसने आपके लिए कुछ और भी अच्छा सोच रखा हो.”

हमको लगा कि सांत्वना दे रहे हैं. हम जाकर ज्वाइन कर लिए. दू महीने के अंदर पिताजी का देहांत हो गया अऊर साल भर के अंदर हमरा सेलेक्सन बिदेस में पोस्टिंग के लिए हो गया. हम घर के लोग को खुसखबरी सुना रहे थे कि माधव राव साहब का बात याद आया. रात को उनका फोन आया बेंगलोर से. “वर्मा जी! कोंग्रचुलेशंस!! डू यू रेमेबर माई वर्ड्स!” अऊर हमरे मुंह से कोनो बात नहीं निकल सका. हम बस “थैंक्स सर” कह पाए!!

आज तेरह साल के बाद फिर से ओही परिस्थिति में एक महीना से घुट रहे हैं. बेटी का दसवां का बोर्ड है अगिला साल अऊर हमरा ट्रांसफर सताईस लोग में सबसे दूर कर दिया गया है. सब लोग के आगे मजबूरी बताकर देख लिए, गिडगिडाकर, समझाकर देख लिए. मगर मदद करने का भरोसा दिलाकर जो गया ऊ दोबारा लौटकर नहीं आया.

बस दू दिन बाद ई सहर से दाना-पानी उठ जाएगा. नया जगह, नया जिम्मेवारी के साथ पता नहीं आप लोग से एतना रेगुलर रूप से मिलना हो पायेगा कि नहीं. सायद नहीं, चाहे कभी-कभी! आँख बंद करके एही सब सोचते हुए माधव राव सर का बात दिमाग में आ रहा था. किताब का पन्ना फडफडाने का आवाज से आँख खुला, किताब बंद करने चले त देखे कि लिखा है:
मैं लोगों के बीच से गुज़रता हूँ और आँखें खुली रखता हूँ. मैं उनलोगों के सद्गुण नहीं अपनाता इसके लिए वे मुझसे नाराज़ हैं. वे मुझसे बेहद नाराज़ हैं, क्योंकि मैंने उन्हें बता दिया है कि छोटे आदमियों के लिए, छोटी मर्यादाएं ही ज़रूरी होती हैं. नाराज़ लोग आग के चारों ओर बैठकर कहते हैं, देखो यह भयानक आदमी और क्या विपत्ति लाता है. उन्हें बौनी मर्यादाओं से डर नहीं लगता. उनके साथ वे सहज ही हिलमिल जाते हैं. अपने मन में वैसे वे सिर्फ एक बात ही चाहते हैं कि उन्हें कोई चोट न पहुंचाए. हालांकि वे इसे सद्गुण मानते हैं मगर वह दरअसल कायरता है. मैं उनके बीच से गुज़रा और मैंने अपने कुछ शब्द वहाँ गिरा दिए. उनकी समझ में नहीं आया कि वे उन शब्दों को फेंक दें या वहीं पड़ा रहने दें. तब मैंने उन्हें ललकार कर कहा – तुम अभिशप्त हो कि कायर हो. जरथ्रुष्ट्र का कोई ईश्वर नहीं, इसलिए वह बुरा नहीं है. मैं ईश्वरहीन हूँ इसलिए सच कहता हूँ और सत्य को तुम्हें भी सुनाता हूँ. अगर मेरे शब्द बेकार गए तो तुम अपने छोटे-छोटे सद्गुणों और नन्हें-नन्हें गुनाहों के साथ नष्ट हो जाओगे!
(नीत्शे – जरथ्रुष्ट्र ने कहा)

सोमवार, 7 मई 2012

हर खुशी हो वहाँ


रात के गहरे से सन्नाटे में यूं ही जो कभी,
छेड़ देता है कोई दिलरुबा के तार पे धुन
एक मीठा सा कोई सुर चुभोता है दिल में
राग भैरव, कभी मालकौंस, जयजयवंती कभी
क्यों मुझे लगता है सरगम में छिपा नाम तेरा!

जब अदाकारी कभी देखता नसीर की हूँ
या कि संजीव की, उत्तम की या अमित जी की
या कोई फिल्म हो शरलॉक की या फेलू की
बक्शी ब्योमकेश हों या सत्यजीत राय की फिल्म
उन अदाकारी के फन में मुझे क्यों दिखता है तू!

 (अनुभव प्रिय)

हों कहानी जो रस्किन बोंड की या राय की
स्वामी हो मालगुडी का या हो विवेकानंद
या कि हो शायरी कैफी की, निदा, साहिर की,
शेक्सपियेर के हों नाटक, या हों गिरीश करनाड
मुझको हर लफ्ज़ में क्यों शक्ल तेरी दिखती है!

रंग वॉन गॉग के हों या पिकासो का क्यूबिज्म
लाइन हुसैन की और बोस के उस गाँव का रूप
जानवर बावा के, और राजा रवि के पोर्ट्रेट
स्याही हो, कोयला हो, पेन्सिल हो, कनवास या बोर्ड
मुझको हर रंग में क्यों तेरी छटा दिखती है!

एक राजा के किसी बेटे के बारे में कभी
एक नजूमी ने कहा था कि ये होगा सम्राट
और न सम्राट हुआ तो ये महात्मा होगा
तुझको मैं बस ये दुआ देता हूँ बेटे मेरे
तू बने जो भी बस उस फन में मुकम्मल बनना!
तुझमें बस अपने बुजुर्गों की झलक दिखती है!!


सालगिरह मुबारक!!!
वत्स अनुभव प्रिय!!