शनिवार, 8 मार्च 2014

नारी


आज “सम्वेदना के स्वर” का कुछ पुरनका पोस्ट सब पढ रहे थे, तब अचानक नजर पड़ा हमारे अभिन्न चैतन्य आलोक जी के कबिता पर. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिबस पर जब 2011 में ई कबिता अपने ब्लॉग पर पर्कासित किए, त रचना जी इसको अपने ब्लॉग पर सेयर कीं. कोनो महिला बिसय पर लिखा जाना अऊर उसको रचना जी के द्वारा सेयर किया जाना, अपने आप में एगो बहुत बड़ा उपलब्धि है.

आज ई कबिता पढते हुए, फिर से आँख भीज गया. लगा आज इसको हम भी सेयर कर लेते हैं.  


वो मेरी तुमसे पहली पहचान थी
जब मैं जन्मा भी न था
मैं गर्भ में था तुम्हारे
और तुम सहेजे थीं मुझे.

फिर मृत्यु सी पीड़ा सहकर भी
जन्म दिया तुमने मुझे
सासें दीं, दूध दिया, रक्त दिया तुमने मुझे.

और जैसे तुम्हारे नेह की पतवार
लहर लहर ले आयी जीवन में

तुम्हारी उंगली को छूकर
तुमसे भी ऊँचा होकर
एक दिन अचानक
तुमसे अलग हो गया मैं.

और जिस तरह नदी पार हो जाने पर
नाव साथ नहीं चलती
मुझे भी तुम्हारा साथ अच्छा नहीं लगता था
तुम्हारे साथ मैं खुद को दुनिया को बच्चा दिखता था.

बचपन के साथ तुम्हें भी खत्म समझ लिया मैने
और तब तुम मेरे साथ बराबर की होकर आयीं थीं..

बादलों पर चलते
ख्याब हसीं बुनते
हम कितना बतियाते थे चोरी के उन लम्हों में
दुनिया भर की बातें कर जाते थे

मै तुम पर कविता लिखता था
खुद को पुरूरवा
तुम्हें उर्वशीकहता था.

और जैसा अक्सर होता है
फिर एक रोज़
तुम्हारे पुरूरवाको भी ज्ञान प्राप्त हो गया
वो उर्वशीका नहीं लक्ष्मी का दास हो गया

तुम फिर आयीं मेरे जीवन में
मैने फिर तुम्हारा साथ पाया

वह तुम्हारा समर्पण ही था
जिसने चारदीवारी को घर बना दिया
पर व्यवहार कुशल मैं
सब जान कर भी खामोश रह गया

और उन्मादी रातों में
तुम जब नज़दीक होती
यह पुरूरवा”, “वात्सायनबन जाता
खेलता तुम्हारे शरीर से और रह जाता था अछूत
तुम्हारी कोरी भावनाऑ से

सोचता हूं ?
इस पूरी यात्रा में
तुम्हें क्या मिला
क्या मिला

एक लाल
और फिर यही सब .....

और जब तुमने लाली को जना था
तो क्यों रोयीं थीं तुम
क्यों रोयीं थीं???

                     -    चैतन्य आलोक 

शनिवार, 1 मार्च 2014

मेरी आवाज़ ही पहचान है


एगो बहुत पुराना कहावत है कि जब आप किसी को इज्जत देते हैं, त आपको भी इज्जत मिलता है. ई बात जेतना सजीव लोग पर लागू होता है ओतने निर्जीव पर भी लागू होता है. सजीव माने आदमी, जानवर अऊर पेड़-पौधा अऊर निर्जीव माने...? तनी सोचिये कि निर्जीब चीज को का इज्जत देंगे हम अऊर ऊ हमको का इज्जत देगा. बाकी अइसा बात नहीं है.

चलिए एगो बात बताइये. आप लोग के साथ केतना बार अइसा हुआ होगा कि कोनो समान, चाहे जरूरी कागज, कोनो किताब कहीं रखा गया अऊर जब आप उसको खोजना सुरू किए त ऊ मिलबे नहीं किया. हर सम्भब जगह पर खोजने के बाद भी ऊ आपको देखाई नहीं दिया. आखिर में हारकर आप मने-मन पछताते हैं कि ठीक से रखे होते त एतना परेसानी नहीं होता. ओही घड़ी आपका बच्चा चाहे घर का कोनो आदमी आकर आपसे पूछता है, यही ढूँढ रहे थे न आप? ये रहा... आलमारी के निचले ख़ाने में रखा था!आप हैरान होते हैं कि तनी देर पहिले त आप पूरा आलमारी देख गये थे, निचलका खाना भी देखे थे. ओ घड़ी त ओहाँ नहीं था, अभी कइसे आ गया!!

तनी सोचिए कि ऊ कागज, चाहे समान जब एतना जरूरी था त उसको सम्भालकर, हिफाजत से रखना चाहिए था ताकि जरूरत के बखत आसानी से मिल जाए. मगर आप उसको इज्जत नहीं दिए अऊर जहाँ-तहाँ रख दिए. अब बताइये, जब आप इज्जत नहीं दीजियेगा, त आपको कहाँ से इज्जत मिलेगा. ऊ समान आपसे अपना बेज्जती का बदला लिया. एही नहीं, जब आप बाद में पछतावा किए, त आसानी से मिल गया, ओही जगह जहाँ आप केतना बार खोज चुके थे. कोई बाहरी अदमी ओहाँ नहीं धर गया, आप ही रखे थे अऊर आपको मिल गया. ऊ का कहते हैं - ऐज़ सिम्पल ऐज़ दैट!!

चलिए एगो अऊर बात बताते हैं. बताते का हैं बस अपना मन का फीलिंग है ओही कहते हैं. कोनो ज्ञानी त हैं नहीं कि हम जो बोलेंगे ऊ पत्थर का लकीर हो जाएगा. गुलजार साहब का सायरी/नज्म का एक खासियत है जिसके कारन हर कोई उनका दीवाना हो जाता है. रोमाण्टिक से रोमाण्टिक बात कहने के लिये ऊ अइसा-अइसा प्रतीक खोजकर लाते हैं अऊर अइसा-अइसा सब्द का प्रयोग करते हैं कि पढने-सुनने वाला बस मोहित हो जाता है. उनका एही खासियत के कारन हम अपना जवानी का दिन से उनका दीवाना हैं अऊर ऊ समय से लेकर आज का नौजवान पीढी तक का फेवरिट हैं ऊ. जो सब्द हमारा रोजाना का बोलचाल से गायब हो चुका था उसको फिर से जिन्दा करने का काम ऊ किये अऊर जो लोग का वाकफियत था ऊ सब्द से उनको अपना भुलाया हुआ माटी का महँक याद दिलाते गए.

असल में ई शब्द भी इज्जत देने से आपको बदला में सम्मान दिलाता है. अऊर जब आप सब्द को सम्मान देते हैं त सब्द आपके साथ एतना परेम से खेलता है कि आपका पहचान बन जाता है. दिनकर जी का रस्मिरथी हो, निराला का सरोज-स्मृति, बच्चन जी का मधुसाला, गुलजार साहब का नज्म हो, के.पी.सक्सेना साहब का कोई आलेख, अपना पहचान अलग से बना लेता है. सलीम-जावेद अऊर फिलिम ‘सोले’ का सम्बाद आज 39 साल बाद भी अपना असर बनाए हुए है, खाली इसलिये कि का कहना है, कोन सब्द को कइसे प्रयोग करना है, यानि हर शब्द को इज्जत दिया ऊ लोग अऊर आज ओही सब्द उनको इज्जत दिला रहा है, मान-सम्मान दिला रहा है.

बास्तव में हर सब्द का बहुत सा मतलब होता है अऊर बहुत सा सब्द को बहुत तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन कब, कहाँ, कोन अर्थ में, किस तरह कोई बात को कहना है, ऊ कमाल का बात है. हमारे पंजाब में शब्द के साथ खेलना एकदम लोक परम्परा के जइसा है. लोग का बातचीत, मजाक करने का ढंग, उनके खुसमिजाजी को चार चाँद लगा देता है. अपने संजय अनेजा (मो सम कौन...) जी के ब्लॉग पर कभी कमेण्ट देखिए अऊर उनका जवाब देखिए. इनसे हाथ मिलाने के बाद उँगली भले गिनकर मत देखिए, लेकिन अपने कमेण्ट में कोनो सब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर कीजिये. आपके हर बात का जवाब देने का तरीका एतना खास है कि पोस्ट के बाद इनका कमेण्ट बोनस का काम करता है.

लोग अस्लील, फूहड़, घटिया चाहे जो मर्जी कह ले (उसपर अलग से बहस), लेकिन स्टैण्ड-अप कॉमेडी में जो पंजाबी लोग कमाल दिखाया है, ऊ कोई नहीं. चाहे सुदेस हो, भारती हो, सिद्धू जी हो या अपना कपिल सर्मा. यसराज फिल्म्स के एगो सिनेमा में काम करने के कारन कपिल का सो हफ्ता में दू दिन के जगह पर खाली एक्के दिन देखाया जाएगा. कपिल बताया कि सूटिंग में बेस्त रहने के कारन समय नहीं मिल पाएगा एही से एक दिन बन्द करना पड़ा. सत्तर मिनट के प्रोग्राम में हर दस सेकण्ड में मजाक गढना कोई आसान काम नहीं है अऊर हफ्ता में दू दिन एही काम करना त अऊर मोस्किल है.

सब्द साधना हो चाहे हर बात को इज्जत देना हो जब सध जाता है तब्बे हम कहते हैं कि अदमी हाजिरजवाब है. सिद्धू जी का तात्कालिक तुकबन्दी हो या कपिल का दस सेकण्ड में बनने वाला तात्कालिक मजाक या (आतममुग्ध होते हुये) फेसबुक पर हमरा कमेण्ट सब्द को इज्जत से दिमाग में रखने से आता है, जिसके भुलाने का त सवाले पैदा नहीं होता है अऊर भुलाइयो जाए त खोजने का जरूरत नहीं पड़ता है!

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

ये कहानी है पुरानी

एगो राजा था. ऊ जंगल में एक रोज सिकार खेलने गया. साथ में सेनापति, मंत्री अऊर एगो नौकर भी था. जंगल में राजा को एगो हिरन देखाई दिया. पीछा करते-करते राजा अपना सब लोग से अलग हो गया. एही नहीं, सेनापति, मंत्री अऊर नौकर भी रस्ता भुलाकर जंगल में भटक गया सब.
रास्ता खोजते-खोजते नौकर को एगो कुटिया देखाई दिया, जिसके बाहर एगो साधु बाबा भगवान का नाम जप रहे थे. ऊ नौकर उनके पास गया अऊर बोला, ओ अन्धे! अभी तूने इधर से किसी को जाते हुए देखा है?
“मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है!
थोड़ा देर के बाद राजा का सेनापति भी ओही कुटिया के पास आया अऊर साधु से पूछने लगा, ओ साधु! तुमने किसी को इधर से जाते हुए देखा है?
“मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है!
सेनापति चला गया, तब भटकते हुए मंत्री जी भी ओहीं पर पधार गए. ऊ हो साधु से पूछ लिए, हे साधु महाराज! आपने किसी को इधर से जाते हुए देखा है क्या?
“मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है!
आखिर में राजा जी भी रास्ता खोजते-खोजते ओही कुटिया के पास पहुँचे. साधु को ध्यान लगाये देख पूछ बैठे, प्रणाम ऋषिवर! क्या आपने किसी को यहाँ से जाते हुए तो नहीं देखा?
“महाराज की जय हो! मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है! किंतु थोड़ी देर पहले आपका सेवक आपको खोजता हुआ इधर आया था, उसके पश्चात आपके सेनापति और फिर महामंत्री. वे सब लगता है आप ही को ढूँढ रहे थे. अब अंत में आप उन्हें खोजते हुए पधारे हैं!
राजा घोर अचरज में पड़ गया कि ई आदमी अन्धा है त इसको कइसे पता चला कि हमको खोजने वाला हमरा नौकर, सेनापति अऊर मंत्री था. अऊर हम महाराज हैं. ऊ साधु से पूछिए लिया, मुनिवर! आप नेत्रहीन हैं. फिर आपने मुझे ढूँढने वालों को कैसे पहचाना?
ऊ साधु हँसकर बोला, महाराज! बहुत आसान है. आदमी बातचीत से पहचाना जाता है. आपके नौकर ने मुझे ओ अन्धे कहकर पुकारा, आपके सेनापति ने ओ साधु कहकर और आपके मंत्री ने हे साधु महाराज कहा. अंत में जब आप आए तो आपने मुझे प्रणाम ऋषिवर कहकर सम्बोधित किया! यह सम्बोधन ही तो किसी व्यक्ति की पहचान हैं!

सायद छट्ठा सातवाँ किलास में ई कहानी पढे होंगे. बाकी अभी तक दिमाग में ताजा है. एतने नहीं, नौकरी भी अइसा मिला है कि जगह-जगह घूमकर समाज के हर तबका के अदमी के साथ दिन-रात उठना बइठना हो गया है. अब त बातचीत से पता चल जाता है कि कऊन जगह का अदमी का, का बिसेसता है अऊर बात करने वाला कम्पनी में कोन ओहदा पर काम कर रहा है. राजा वाला खिस्सा के जइसा बड़ा कम्पनी का डायरेक्टर जेतना सालीनता से बतियाता है, ओतने अकड़कर कम्पनी का चपरासी बात करता है. मगर अपबाद भी बहुत देखने को मिला है. अब का करें, हमलोग त सेवा छेत्र में हैं, इसलिए अपना आपा घरे रखकर आते हैं. न रहेगा मैं न होगा झंझट-तकलीफ.

अभी कुछ टाइम पहिले, बड़े भाई सतीस सक्सेना जी हमरे एगो कमेण्ट के जवाब में बोले -

शुक्रिया सलिल भाई,
बिना पढे टिप्पणी देने वाले ब्लॉगरों में सलिल जैसे (एहाँ पर जो सब्द लिखा था ऊ लिखना हम जरूरी नहीं समझते हैं) भी मुझे पढते हैं मेरे लिए यह कम गौरवशाली नहीं. आपके शब्द मुझे याद हैं और वे यकीनन प्रेरणादायक हैं.
आभार भाई!!
ई बात सतीस जी केतना बार कहे हैं अलग-अलग जगह पर. अऊर बात सच भी है. ऊ कहानी के हिसाब से आपके पोस्ट पर जेतना कमेण्ट आता है ना, ऊ कमेण्टवा सबको ध्यान से पढ़िये. आपको अपने बुझा जाएगा कि कऊन अदमी आपका पोस्ट पढने के बाद कमेण्ट किया है अऊर कऊन बिना पढे; किसको आपका कबिता समझ में आया है, किसको नहीं; कऊन आपका असली परसंसक है, कऊन नहीं.

बहुत सा लोग का कमेण्ट का लम्बाइये से आपको बुझा जाता है कि पूरा पढने के बाद आपका कहा हुआ हर बात के साथ सहमत चाहे असहमत होते हुए अपना बात लिख रहे हैं. अऊर का मजाल है कि उनका कहा हुआ कोनो बात का बुरा लग जाए. अइसा लोग का कमेण्ट अच्छा लिखने का प्रेरना के साथ-साथ, खुद का आकलन करने का मौका भी देता है. एही नहीं ब्लॉग जगत का एगो मोहावरा “आत्ममुग्ध होना” भी लिखने वाला के साथ नहीं चिपकता है.

ई त सोचने वाल बात है कि हर अदमी का लिखा हुआ सब पोस्ट आपको पसन्द आए, उसमें कहा हुआ हर बात से आप सहमत हों अऊर कोनो पोस्ट में कोई कमी नहीं देखाई दे. अइसा हालत में अच्छा लिखा है त खुलकर तारीफ कीजिए, बाकी कहीं कमी नजर आए त ऊ भी बताइये जरूर. बिगाड़ के डर से ईमान का बात न कहने से बहुत नोकसान हुआ है समाज में.

अंत में एगो अऊर छोटा सा कहानी ऊ लड़िका का, जो हर आने-जाने वाला राहगीर को पत्थर मारकर लुका जाता था. एक रोज एगो अदमी उधर से गुजरा त उसको भी ढेला मारा ऊ लड़िका. ऊ अदमी गुसियाया नहीं, बल्कि उसको बोलाकर चार आना का सिक्का धरा दिया. एतना सानदार ईनाम पाकर अगिला अदमी को बड़का पत्थर फेंककर मारा. ई अदमी उसको पकड़कर पीट दिया. इसलिये आप अपना कमेण्ट का चवन्नी देकर कहीं ऊ बच्चा का नोकसान त नहीं न कर रहे हैं. ज़रा सोचिये. जो अच्छा नहीं लगा उसको खुलकर बताइये. गदहा को गदहा कहिए, वैशाखनन्दन कहकर काहे हमारा इज्जत बढाते हैं. अपने मुनव्वर राना साहब भी कहते हैं कि

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए!

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

मेरे भैया - एक लघु-कथा

रामलाल के रिटायर होने के बाद, उसके सामने दो सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी थी, सिर पर एक मुकम्मल छत और बेटी का ब्याह. रिटायरमेण्ट के पैसों से वो सिर पर पक्की छत का तो इंतज़ाम कर सका, ताकि इज़्ज़त से मकान में नहीं घर में रह सके. लेकिन ईमानदारी की नौकरी में उसने कोई जमा-पूँजी नहीं इकट्ठा की इसलिए रजनी की शादी की उसे बड़ी चिंता रहती थी. कहने को तो वो बड़े फ़ख्र से कहता था कि उसकी असली जमा पूँजी तो उसकी औलाद हैं, बेटा रमेश और बेटी रजनी. उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाकर इस क़ाबिल बना दिया है कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें.

रमेश अच्छी नौकरी पर लग गया और उसने पिछले साल दिल्ली में अपने साथ काम करने वाली एक लड़की से शादी कर ली. लड़की वाले जल्दी शादी करने पर इतना ज़ोर दे रहे थे कि समय कम होने के कारण रामलाल और रजनी शादी में शामिल नहीं हो पाए. हालाँकि शादी के महीने भर बाद वो अपनी पत्नी को उनसे मिलवाने ले गया. बहू की जमकर आवभगत हुई और फिर एक सप्ताह के बाद दोनों काम पर लौट गए. हर हफ्ते नियम से फ़ोन करते हैं दोनों.

रामलाल जब भी कभी रजनी की शादी की बात रमेश से करता है तो वो अपनी मजबूरी बता देता है कि नई नौकरी है, समय की कमी है, दिल्ली में उसकी बिरादरी के लड़के कहाँ मिलते हैं. घुमाफिराकर रामलाल को उसने यह भी कह दिया कि अब आप रिटायर हो चुके हैं तो बिरादरी में ढूँढिए, परिवार में देखिए, रिश्तेदारों को कहिए... ज़रूर अच्छा रिश्ता मिल जाएगा साथ यह भी जता दिया था कि उसने अभी नया घर बसाया है इसलिए पैसों की तंगी लगी रहती है.

रजनी पढ़ी लिखी लड़की थी, नौकरी की तैयारी भी कर रही थी. यह भी समझती थी वो कि उसका भाई उसके लिए कोई रिश्ता नहीं ढूँढेगा और बूढे बाप के लिए इधर उधर भटकना मुश्किल था. उसे किसी से प्यार भी तो नहीं था कि लव मैरिज का ही सन्योग बन जाता. उसकी शिक्षा और आत्मसम्मान ने उसके चरित्र को इतना मज़बूत तो बना ही दिया था कि वो किसी पर डोरे डालने जैसे स्तर तक भी नहीं जा सकती थी.

एक दिन रजनी की पक्की सहेली ने किसी से उसका परिचय करवाया. उसका व्यवहार बिल्कुल खुली किताब की तरह था. एक खुली खिड़की की तरह कोई भी उसके अन्दर झाँक सकता था. उसमें कोई भी ऐसा ऐब रजनी को नहीं दिखा, जिससे वो उससे दूर हो सके. उसने रामलाल को भी उससे मिलवाया. बूढ़ा बाप... उसे तो यूँ लगा मानो उसका रमेश उसे मिल गया हो.

जल्दी ही उसने रजनी के लिये बिरादरी  के अन्दर कुछ रिश्ते सुझाए.  उनमें से कुछ वाहियात लोग निकले, कुछ लड़के लोफर निकले.. लेकिन वो तो पता चल ही जाता है. शादी कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं. फिर भी रजनी ने उसपर भरोसा नहीं खोया. रामलाल को भी बस उसपर ही भरोसा था. उसने रजनी से कहा कि वो बस अपने शहर या उसके आस-पास ही रिश्ता चाहती है ताकि बाबा को जब चाहे आकर देख ले, मिल ले. अगर वो कहे तो किसी और शहर में भी अच्छे लड़के मिल सकते हैं. रजनी ने बाबा से बात की और बनारस या उसके पास लड़का देखने की बात बताई. सोचा बनारस में रजनी की बुआ रहती हैं, इसलिए लड़के के घर-परिवार का पता लगाने में सहूलियत रहेगी.

इसे संजोग कहें या रजनी की किस्मत. उसने तीन-चार रिश्ते बनारस, लखनऊ के बताए. बनारस के एक परिवार में बात आगे बढ़ी और उन्होंने साफ कह दिया कि उन्हें बस लड़की के गुण और व्यवहार की गारण्टी चाहिए, वे बिना दहेज शादी करने को तैयार हैं. रजनी की बुआ ने बताया कि उस परिवार में उनके ससुराल की रिश्तेदारी है. लड़का बड़ा सुशील है, कोई ऐब नहीं, अच्छी नौकरी है और रमेश से अच्छा कमाता है.

अगले ही हफ्ते रजनी रामलाल के साथ बनारस अपनी बुआ के पास चली गई. लड़के वालों को लड़की बहुत पसन्द आई. उन्होंने रजनी के पढ़ने या नौकरी करने से कोई ऐतराज़ नहीं जताया. शादी पक्की और सगाई की तारीख हफ्ते भर बाद की तय हो गई. बैंक से पैसे निकालकर, जल्दी-जल्दी रामलाल ने सारी तैयारियाँ की.

आज रजनी की सगाई है और वो जितना खुश अपनी सगाई से नहीं है, उससे ज़्यादा खुशी उसे इस बात की है कि उसके बाबा खुश हैं. रमेश भैया को ख़बर कर दी गई, लेकिन उसके पास कोई ज़रूरी प्रोजेक्ट था इसलिए वो नहीं आ सका. हाँ उसने ये वादा किया कि वो शादी पर ज़रूर आएगा भाभी के साथ.

इस खुशी और जश्न के माहौल में वो उसे कैसे भूल सकती थी, जिसकी वज़ह से ये खुशियाँ उसके जीवन में आई थीं. उसे इतना अच्छा रिश्ता मिला. उसने वो किया जो उसका सगा बड़ा भाई भी नहीं कर पाया. ख़ैर ये समय कड़वाहट का नहीं. उसने सोचा कि अपने इस "अनोखे भाई" को एकबार धन्यवाद तो कह दे.

उसने लैपटॉप ऑन किया और टाइप किया डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू. जोडियाँस्वर्गमेंबनतीहैं.कॉम. साइट के खुलते ही उसने मुस्कुराकर कहा – मेरे भैया! तुम्हें शुक्रिया कहते हुए शर्म आ रही है! तुम्हारी वज़ह से आज ये दिन नसीब हुआ है. लव यू भैया!!

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

गिफ्ट - रिटर्न गिफ्ट

तनी मनी अन्धबिस्वासी हर अदमी होता है. अब ऊ चाहे निपट गँवार हो, चाहे पढ़ा-लिखा समझदार. कोनो न कोनो अन्धबिस्वास मन में जरूर बइठाए रहता है. छींक देने से काम गड़बड़ हो जाना, मगर दू बार छींक देने से पहिलका का असर ख्तम हो जाना, सामने में छींकने अऊर पीठ के पीछे छींक सुनाई देने के असर में बहुत फरक होता है. ओइसहिं बिलाई रस्ता काट जाए त काम बिगड़ जाना, अऊर करिया बिलाई हो त बस काम खतमे समझिए. कोनो जरूरी काम से निकलिए अऊर कोनो पीछे से पुकार ले त बस बंटाढार. अब लौटकर घर के अन्दर आइए अऊर एक गिलास पानी पी लीजिए, तब निकलिए. नहीं त दही खा लेने से ऊ सब खराब असर खतम हो जाता है.

एगो कहावत था हमलोग के लड़िकाई में – भुसकोल बिद्यार्थी का बस्ता भारी! माने पढ़ना लिखना साढ़े बाईस, टिकिया घोस में नाम लिखाइस ( साढ़े बाईस यानि 30% से कम नम्बर लाने वाला और टिकिया घोष यानि टी.के. घोष एकैडमी – पटना का एक स्कूल जिसमें कोई पढ़ना नहीं चाहता जबकि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, श्री बिधान चन्द्र रॉय और मेरे स्वर्गीय पिता जी इसी स्कूल के छात्र रह चुके हैं). ऊहो बिद्यार्थी परिच्छा देने जाएगा त भर कटोरा दही खाकर, एकदम आजमाया हुआ नोस्खा है. साढ़े बाईस वाला बिद्यार्थी भी पचीस परसेण्ट ले आता है.

हमरे चैतन्य जी, भद्रा देखिए के सब जरूरी काम करते हैं. कोनो दिन काम गड़बड़ा जाता है त फोन करके बताते हैं, क्या बोलूँ सर जी! सब चौपट हो गया! पता नहीं कैसे मेरे दिमाग से निकल गया कि आज दो बजकर अट्ठाईस मिनट तक भद्रा है! बिजली वाले इंजीनियर हैं, मगर ई सब मामला में ज्योतिस इंजीनियर पर भारी पड़ जाता है.

हम सब भाई लोग बिलाई के रस्ता काटने वाला अन्धबिस्वास नहीं मानते हैं. अगर रास्ता काटते हुए देखाइयो दे जाता है त रोड पर हम लोग दौड़कर काटा हुआ रस्ता को पार करने का कोसिस करते हैं. असल में ट्रैफिक रुक जाता है रोड पर – पहिले आप, पहिले आप के चक्कर में. बाकी हमलोग त ठहरे बुड़बक, ऊ एगो मसहूर लाइन है ना ई. एम. फोर्स्टर साहब का - Fools rush in, where Angels fear to tread!

मगर अइसा नहीं है कि हम बहुत परगतिसील हैं. हमहूँ अन्धबिस्वास पर बहुत बिस्वास करते हैं. सनीचर के दिन कोनो अदमी को पइसा नहीं देते हैं, मतलब बजटेड पइसा से बाहर. जो हिसाब किया हुआ खर्चा है उसके अलावा. किसी का कर्जा भी लौटाना है त सोमबार को लौटाएंगे बाकी रहते हुए सनीचर को नहीं. का मालूम कहाँ से ई बात दिमाग में बइठ गया है कि सनीचर को बैंक आधा होता है अऊर एतवार को बन्द. कहीं किसी को दे दिया अऊर कोनो इमर्जेंसी हो गया त किससे माँगने जाएंगे! आज जमाना चौबीस घण्टा नगदी वाला हो गया है अऊर आधा दर्जन क्रेडिट कार्ड रहता है पर्स में, मगर अन्धबिस्वास बैकवर्ड होता है ना, उसको थोड़े ना पता है कि ए.टी.एम का होता है!

कहीं भी बाहर जाने के नाम पर रेल/हवाई जहाज का टिकट कनफर्म होने पर भी दू दिन पहिले से खाना बन्द अऊर टॉयलेट चालू. पूरा जात्रा के बीच में फिर से कोनो बजेटेड खर्चा से बाहर खर्चा करने में डर लगता है. हजार रुपया का खाना खा लेंगे, मगर पाँच सौ रुपया कोई चीज खरीदना हो त सिरीमती जी अपना फण्ड से खरीद लें, हम अपना जेब ढीला नहीं करते हैं. का मालूम काहे एगो अजीब सा डर मालूम होता है.



पटना से लौटते समय अहमदाबाद का दिल्ली से ट्रांजिट फ्लाइट था. तीन घण्टा दिल्ली में टर्मिनल-3 पर इंतजार. सिरीमती जी फोन पर बिजी थीं अऊर हम दुनो बाप-बेटी बुक-स्टॉल में. ऊ अपना किताब देख रही थी अऊर हम अपने मतलब का किताब देखने में मगन थे. खरीदना नहीं था हमको, काहे कि ऊ हमरे बजट में नहीं था. अचानक देखाई दिया रवि सुब्रमनियन का – BANKERUPT!  इनका अब तक का पूरा कलेक्सन है हमरे पास. ई किताब नया था. उलट-पलट कर देखे, अऊर मने मन सोचे कि फ्लिपकार्ट से मंगवा लेंगे! एगो अऊर किताब पता चला कि हमसे छूट गया इन्हीं का – BANKSTER! दुनो किताब नोट कर लिए. ओही समय मोबाइल पर सिरीमती जी का फोन आ गया, कहाँ हैं? हमको यहाँ बैठाकर खुद गायब हो जाते हैं!
आ रहे हैं! अब इस उमर में कहाँ जाएँगे छोडकर!
कोई मिलेगी भी नहीं अब आपको! लौटकर यहीं आना होगा!
एही सब बतियाते हुए, हम वेटिंग लाउंज के तरफ सिरीमती जी को कम्पनी देने बढ़ गए!
झूमा? आपही के साथ थी न?
ओफ्फोह कोनो बच्चा है जो भुला जाएगी! एक्साइटमेण्ट में एही बोली निकलता है मुँह से! वो देखो, आ रही हैं मेम साब!
खाली फालतू पैसा बरबाद करती है. देखिए नॉवेल लेकर आ रही है. कोर्स का किताब कभी देखे हैं इतना मन लगाकर पढते हुए!

तुम भी बेकार उसके पीछे पड़ी रहती हो. अब यहाँ कोर्स का किताब पढेगी!

तब तक बेटी हमरे सामने आकर खड़ी हो गई अऊर पैकेट हमरे हाथ में थमा दी!

क्या ली?

खोल के देखो डैडी!

खोलकर देखे, त उसमें रवि सुब्रमनियन का ओही किताब BANKERUPT था!

आपको आपकी एनिवर्सरी पर कोई गिफ़्ट नहीं दे सकी! ये तो आपके फेवरिट हैं! और आप खरीदोगे भावनगर जाकर फ्लिपकार्ट से, इसलिए मैंने अभी ले लिया!

सो स्वीट!

मेरा रिटर्न गिफ्ट दो!

हम मुस्कुरा दिए. मने मन कहे:

तुम्हें और क्या दूँ मैं दिल के सिवाए,
कि तुमको हमारी उमर लग जाए!

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

हाथों में तेरे मेरा हाथ रहे

साल 1984:
अच्छा नौकरी मिल जाने अऊर दू बरिस नौकरी कर लेने के बाद घर में सादी का बारे में लोग सीरिअस हो जाता है अऊर घर का लोग से जादा समाज का लोग. एक से एक रिस्ता का रेकमेण्डेसन. लड़की का बिआह जेतना मोस्किल होता था ऊ टाइम में, ओतने मोस्किल लड़का का भी बिआह करना होता था. उसको भी नौकरी करते हुए दू बरिस हो चुका था. रिस्ता का बात भी सुरू हो गया था अऊर दोस्त लोग भी पूछने लगा था कि कहो तो एकाध गो रिस्ता हम भी भेजवाते हैं. कहो त लड़की देखा देते हैं चुपके से, दूर से देखकर पसन्द कर लो. अऊर तुम तो भाई बहुत इस्मार्ट हो, लड़की भी तुम्हारे टक्कर का सुन्दर है. मगर ऊ बहुत सांत लड़का था. हँसकर टाल जाता था.

दू-चार रोज छुट्टी के बाद एक रोज जब ऊ आया त उसका हुलिया बदला हुआ था. हाथ में सोना का अंगूठी, नया-नया सर्ट-पैण्ट, हाथ में नया एच.एम.टी. का घड़ी, नया सैण्डिल के अन्दर आलता से रंगा हुआ गोड़. मतलब मुर्गा हलाल हो चुका था. हम सब लोग उसका खूब क्लास लिए कि बिना दोस्त लोग को बताए ऊ कब सादी कर लिया. ऊ भी एतना चट-पट! खैर, हमको ऊ एतवार के रोज अपने घर पर बोलाया.

गिफ़्ट लेकर जब हम पहुँचे, त ऊ अपना रूम में ले गया, जहाँ नया दुल्हिन माथा पर आँचल रखकर बैठी हुई थी. हम दुल्ह्न को गिफ़्ट पकड़ाए, त ऊ हमको बैठने के लिए बोलकर चाय-नास्ता लाने चली गई. लड़की का चेहरा देखकर हमको बहुत अजीब लगा. उसके साथ कोनो मेल नहीं था लड़की का. एकदम साधारन लड़की.

मगर ऊ बहुत खुस था. चाय-नास्ता के साथ लड़की से बात-चीत हुआ, त हमको लगा कि चेहरा मन का आईना जरूर होता है, मगर बहुत बार धोखा भी दे जाता है. कुल मिलाकर हमको लगा कि ऊ दुनो का जोड़ी एकदम “मेड फ़ॉर ईच अदर” था.
लौटते समय ऊ हमरे साथ बस स्टैण्ड तक आया, तब बातचीत सुरू हुआ.
“क्यों! हैरान हो ना?”
”हाँ यार! एक तो इतनी गुपचुप शादी और उसपर...!”
“तो तुम भी सोचते होगे कि मैंने दहेज के लालच में एक ऑर्डिनरी लड़की से शादी कर ली?”
“....”
”तुम्हें दिखा मेरे घर में ऐसा कुछ?”
”मैं किसी लड़की को बुरा नहीं कहता. लेकिन ऐसा हुआ क्या?”
”कुछ नहीं. बस हुआ वही जो शायद लिखा था पहले से. जोड़ियाँ स्वर्ग में ही बनती हैं. घर में शादी की बात चल ही रही थी. एक दिन मुझे माँ ने कहा कि मेरी बुआ की जानपहचान की एक लड़की है. बुआ की ज़िद है कि मैं जाकर उसे देख लूँ! पसन्द ना आए तो बेशक मना कर दूँ.”
“और तुम देखते ही रीझ गए?”
”नहीं! देखते ही नहीं, सुनते ही रीझ गया!”
”क्या मतलब?”
”मैं ड्राइंग रूम में बैठा था, तो वो चाय लेकर आई. घरेलू कपड़े पहने हुए, बालों में तेल लगाए, न कोई मेक-अप, न साज सिंगार. नॉर्मली लड़की चाहे जैसी भी हो ऐसे मौकों पर सजती ज़रूर हैं! वो चाय रखकर बैठ गई. मेरे कुछ कहने के पहले ही वो बोल पड़ी कि आप चौंकिए मत. अपनी बुआ को मना कर दीजिए. उनकी ज़िद के कारण कई लोग मुझे देखने आते हैं और रिजेक्ट करके चले जाते हैं. अब मैं अपनी शक्ल सूरत तो बदल नहीं सकती. तंग आ गई हूँ. आप भी वही करेंगे!”
”क्या बात कर रहे हो!! फिर तुमने क्या कहा?”
”कहना क्या था. मैंने तुरत कह दिया कि वो मुझे पसन्द है. उसका चेहरा सुन्दर भले न हो, लेकिन उसकी ईमानदारी मुझे पसन्द आई. और तुम्हें तो पता है कि मेरे परिवार के लिए बस ऐसी ही लड़की चाहिए.”
”और तुम्हारी फ़ैमिली?”
”मियाँ बीवी राज़ी तो क़ाज़ी साहब को तो बस ‘क़ुबूल है’ ही रिकॉर्ड करना होता है ना!”

साल 1988:
अपना लड़की के रिस्ता के लिए एगो औरत लड़का वाला के घर गईं. पता चला लड़का का त सादी हो गया. ऊ औरत की ननद बोली कि काहे नहीं आप इनकी बेटी को अपना बेटा के लिए देख लेती हैं. बरसात का ई आलम था कि चारो तरफ पानी जमा हुआ था. लड़की एगो इस्कूल में काम करती थी. पता चला अभी आने वाली है अऊर एही रास्ता से जाएगी. थोड़ा देर में ऊ लड़की पानी में सलवार ठेहुना तक उठाकर चलते हुए सामने से अपना घर में जाने लगी. छोटा कद, साधारन चेहरा मोहरा... लड़का के माँ को लड़की कुछ खास पसन्द नहीं आई. इसलिए लड़का के सादी का बात आगे नहीं बढ़ सका.

दू महीना बाद, ओही लड़की के सादी के लिए लड़का के घर रिस्ता आया. घर में सबलोग एक सुर में बोला कि लड़की को देखकर पसन्द ना-पसन्द लड़का के अलावा कोई नहीं करेगा. खैर फैसला हुआ कि जाकर देख लो अऊर बात कर लो.

लड़की के चाचा के घर साम को लड़की देखने का तय हुआ. साम को इंतजार होने लगा लड़की का, मगर बहुत देरी हो रहा था उसको आने में. पता चला ऑफिस में कोई बहुत जरूरी काम आ गया है. लड़की जब आई, त उसको जल्दी-जल्दी में तैयार होने का टाइम नहीं मिला. जल्दी से कपड़ा बदल कर उसको चाय लेकर लड़का अऊर उसके भाई के सामने भेज दिया गया. लड़का देखा कि ब्लाउज का बाँह बिना आयरन किया हुआ है. ऊ मुस्कुरा दिया. अपना भाई से धीरे से पूछा कि तुमको लड़की पसन्द है? उसका भाई बोला – हाँ!


बस बात फाइनल हो गया. नवम्बर 1988 में सगाई अऊर 18 जनवरी 1989 को सादी. सादी का पच्चीस साल हो गया है. अऊर बिस्वास हो गया है कि जोड़ी सचमुच ऊपर से बनकर आता है!