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रविवार, 11 सितंबर 2011

इनसे मिलिए!!


इधर कुछ ब्यस्त रहे, कुछ परेसान रहे अउर कुछ... बस का मालूम काहे अस्थिर से बइठकर कुछ लिखने का मने नहीं किया. आज मनोज भारती जी से बात होने लगा त हर बार के तरह बात सुरू करते हुए ऊ पूछे कि अगला पोस्ट में हम का लिखने जा रहे हैं. कुछ तय नहीं था त हम भी कहे कि देखते हैं. तब ऊ जिद करने लगे कि अभी आप अपना इंटरव्यू के बारे में लिखे हैं, मगर एगो इंटरव्यू पहिलहीं से पेंडिंग है. ओही काहे नहीं पोस्ट कर देते हैं. तब खेयाल हुआ कि हमारा एगो पोस्ट पर आप लोग हमसे हमारा बेटी जो इंटरव्यू ली थी, ऊ छापने के लिए बोले थे. बेटी के इस्कूल में का हुआ मालूम नहीं, लेकिन इहाँ बहुत सहमकर, डरते-डरते हम ई पोस्ट कर रहे हैं.


प्रतीक्षा प्रिया: आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
सलिल वर्मा: इस प्रश्न का उत्तर मैं पहली बार आपको बता रहा हूँ. दरअसल मुझे ब्लॉग लिखने की प्रेरणा अमिताभ बच्चन और विवेक शर्मा के ब्लॉग से मिली. अमित जी के ब्लॉग पर कई बार मैं यह लिख के आया कि आपकी एक अंग्रेज़ी कविता, जिसका हिन्दी अनुवाद आपके पिताजी ने किया था, प्रकाशित करें. लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया और कविता भी नहीं छापी. मुझे ये एकतरफा संवाद पसंद नहीं आया. क्योंकि दूसरी ओर विवेक शर्मा के ब्लॉग पर की गई हर प्रतिक्रया वो ऐक्नोलेज करते. तब मैंने अपने मित्र चैतन्य आलोक जी के साथ मिलकर संवेदना के स्वर ब्लॉग शुरू किया. चला बिहारी तो बहुत बाद में आया.

प्र. प्रि.:  आपने ब्लॉग लेखन के लिए यह भाषा क्यों चुनी?
स.व.: मेरे ब्लॉग की भाषा हिन्दी ही है. बिहार के अधिकतर लोग हिन्दी इसी तरह बोलते हैं. कई लोगों ने मुझसे कहा भी कि आप भोजपुरी में क्यों नहीं लिखते. उसका कारण भी यही है कि भोजपुरी मेरी भाषा नहीं है. बिहार में मैथिली भाषा के साथ-साथ भोजपुरी, मागधी और वज्जिका बोलियां बोली जाती हैं. मैं मगध से हूँ इसलिए मेरी बोली मागधी है. आज भी घर पर कुछ सम्बन्धियों के साथ इसी बोली में बतियाता हूँ. मेरी माताजी भोजपुरी अंचल से आती हैं. लेकिन अब तो वो भी नहीं बोल पातीं. इस बोली में ब्लॉग लिखने का कारण मात्र इतना है कि मैं इसमें अपनी आत्मा महसूस करता हूँ. कई लोगों ने शिकायत की कि पढ़ने में तकलीफ होती है, हिन्दी में लिखें. लेकिन मेरा उत्तर यही रहा है कि फिर तो इस ब्लॉग की आत्मा समाप्त हो जाएगी.

प्र. प्रि.: आप अपनी लेखन शैली के विषय में क्या कहना चाहेंगे?
स.व.: बस इतना कि मैं कोइ साहित्यकार नहीं हूँ और न ही साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. हाँ, अच्छे साहित्य की समझ भर है मुझमें. मुझसे अच्छा लिखने वाले कई लोग ब्लॉग जगत में हैं और उनके ज्ञान और भाषा-शैली की बराबरी मैं कभी नहीं कर सकता. इसलिए मैंने बात करने की शैली अपनाई. मेरी हर पोस्ट पाठक से बात करती हुई मालूम होती है. वैसे सही शब्द होता बतियाती हुई होती है. मेरी कोशिश यही रहती है कि हर पढ़ने वाले के साथ पोस्ट के माध्यम से एक जुड़ाव पैदा कर सकूं. कितना सफल हुआ यह तो मेरे पाठक ही बता सकते हैं.

प्र. प्रि.: आपके पसंदीदा ब्लॉग कौन-कौन से हैं?
स.व.: कोइ टिप्पणी नहीं. वो सारे ब्लॉग जिन्हें मैं पढता हूँ, जिनपर अपनी बात कहता हूँ, वो सब मेरे पसंदीदा ब्लॉग हैं.


प्र. प्रि.: आप अपने लेखन के लिए विषय कैसे चुनते हैं?
स.व.: यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है. आधी ज़िंदगी गुज़ारने के बाद (माँ ने सौ साल जीने की दुआ दी थी) सोचा मैंने कि जीवन में कई घटनाएं मेरे साथ घटीं या शायद परमात्मा ने उन घटनाओं के एक पात्र के रूप में मुझे चुना. उन घटनाओं को सम्मान देने, उससे जुडे लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने उन घटनाओं को अपनी पोस्ट का विषय बनाया. मेरी चेष्टा यही रही कि इन घटनाओं के बहाने मेरे पाठकों को अपने जीवन की ऐसी ही किसी घटना को पुनः जीने का अवसर मिले.

प्र. प्रि.: इस पूरी ब्लॉग-यात्रा में आप किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेना चाहेंगे?
स.व.: निस्संदेह ऐसा व्यक्ति तो बस एक ही हो सकता है. मेरे मित्र चैतन्य आलोक. जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया, मेरे ज्ञान को एक नया विस्तार दिया और मुझे दुबारा लिखने को प्रोत्साहित किया. मेरी हर पोस्ट के वे पहले श्रोता हैं और अगर किसी कारणवश वो पोस्ट उनको न सुनाई जा सकी तो पोस्ट टाल दी है मैंने, मगर सुनाना नहीं टला.

प्र. प्रि.: अंत में एक व्यक्तिगत प्रश्न... क्या आपके परिवार के लोग आपका ब्लॉग पढते हैं? उनकी क्या राय है आपके ब्लॉग के विषय में?
स.व.: मेरी पत्नी बिलकुल नहीं पढ़तीं. कभी-कभार अपनी कोइ पोस्ट पढकर ज़बरदस्ती सुना देता हूँ उनको, तो सुन लेती हैं. यह पूछने पर कि कैसी लगी, उनका एक ही उत्तर होता है कि आपने लिखी है तो बुरी हो ही नहीं सकती. पटना में मेरा पुत्र, मेरा भाई, उसकी पत्नी और मेरी माँ बहुत पसंद करते हैं. विशेष तौर पर वे पोस्ट जिनमे उनसे जुडी यादें सिमटी हों.

प्र. प्रि.: बहुत अच्छा लगा आपसे बातें करके. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!