बुधवार, 29 जून 2011

मैं और मेरी परछाईं

पन्द्रह अगस्त अउर छब्बीस जनवरी का राष्ट्रीय त्यौहार हमरे अपार्टमेंट में बहुत जोस के साथ मनाया जाता है. सुबह झंडा फहराना, फिर बच्चा लोग का कबिता, गाना अउर भासन, दिन भर खेल कूद का परतिजोगिता अउर रात में कल्चरल प्रोग्राम. तब चैतन्य जी भी हमरे साथ रहते थे. हम दुनो मिलकर प्रोग्राम का रूपरेखा बनाते, पोस्टर लगाते, रिहर्सल देखते, गाना सुनते अउर इसके अलावा नौकरी भी कर लेते थे.

ऊ साल चैतन्य जी डिसाइड किये कि रियलिटी शो के जईसा हम लोग भी तीन ठो जज रखेंगे इस्टेज पर. एगो नया आइटम भी हो जाएगा अउर जब तक जज लोग का कमेन्ट अउर मजाक चलेगा, तब तक अगिला प्रोग्राम का बच्चा लोग तैयार हो जाएगा. हो गया फाइनल, तीन जज में से हम, चैतन्य अउर हमरे एगो साथी की पत्नी, रचना भाभी का नाम फाइनल हो गया. स्क्रिप्ट पर काम चलने लगा. तब अचानक एक रोज बातचीत करते करते हम बिहारी भासा में कुछ मजाक में बोले. बस चैतन्य जी उठकर खडा हो गए, बोले, “मिल गया मुझे तीनों जजों का कैरेक्टर.”

उनका कहना था कि हमलोग अपने असली रूप में नहीं रहेंगे. जब मजाक करना है त दोसरा कैरेक्टर में बनकर हमलोग मजाक करेंगे, “आपका कैरेक्टर फाइनल है लालू यादव का और आपका नाम रहेगा आलू यादव. मैं किशोर कुमार और मेरा नाम शोर कुमार. भाभी जी बनेगी ऋतू बेरी और कहलाएंगी फेंकू बेरी, क्योंकि इनसे लंबी-लंबी फेंकने वाली औरत के डायलाग बुलवाने हैं.”

बस सबकुछ तय हो गया. अपार्टमेंट में पोस्टर लगा दिया गया कि तीन मसहूर मेहमान हमारे प्रोग्राम में पधार रहे हैं, वही जज होंगे प्रोग्राम के. नाम नहीं बताया गया था. बस कहा गया कि कुछ ख़ास कारन से उनका नाम अभी गुप्त रखा गया है. अपार्टमेंट में कानाफूसी सुरू हो गया. कहीं भी कोइ मिल जाता तो धीरे से पूछता था कि बर्मा जी किसको बोला रहे हैं. औरत मंडली हमलोगों के धरमपत्नी को टटोलने में लगा हुआ था. मगर सस्पेंस जो बहाल हुआ सो आख़िरी टाइम तक नहीं टूटा.

प्रोग्राम सुरू होने के पहले मंच पर कोना में टेबुल अउर तीन ठो कुर्सी लाकर रख दिया गया. टेबुल पर गुलदस्ता सजा दिया गया. अभी भी सस्पेंस बाकी था. चैतन्य जी अउर रचना भाभी का मेकप लगभग ओरिजिनल था. माने उनका चेहरा हर रोज के जईसा था. हमको कहा गया गया था तनी इस्पेसल मेकप करने के लिए. साथ में हिदायत भी कि हमको बाद में आना है. चैतन्य जी का आदेस था कि हम मोटर साइकिल पर, दुनो तरफ अपने अपार्टमेंट के दू गो गार्ड के साथ (नकली) बन्दूक के सिकोरिटी में दरसक लोग के बीच से आयेंगे. आने के पहले तीन चार बार घोसना किया जा चुका था कि बस अब हमारे अतिथि आ चले हैं.

हम मेकप करके घर में बंद थे. सबलोग प्रोग्राम अउर चीफ गेस्ट के इंतज़ार में था, इसलिए हमरे तरफ किसी का ध्याने नहीं गया कि हम देखाई नहीं दे रहे हैं. चैतन्य जी धीरे से हमलोग के एगो सहकर्मी ससांक को इसारा किये कि जाकर बर्मा जी को बुला लाओ. नीचे गार्ड रूम में मोटर साइकिल रेडी था. ऊपर चौथा मंजिल पर हमरे फ़्लैट में ससांक घंटी बजाया. किचेन से झांककर देखे कि ससांक है, त हम दरवाजा खोले.

ससांक हमको देखकर बोला, “प्रणाम चाचा जी! वर्मा सर अंदर हैं? ज़रा बुला दीजिए.”

हमको लगा कि मेकप एकदम पक्का है. हंसकर हम बोले, “ अरे शशांक बाबू, हम ही हैं. चलिए.” ससांक का लजाया हुआ चेहरा देखने लायक था. अउर जब हमरा एंट्री हुआ त दरसक लोग भी सुरू में सोच में पड़ गया कि ई कौन है.

प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. हम तीनों का कैरेक्टर एस्टैब्लिश हो गया. आज भी ओही प्रोग्राम का तस्वीर हमरा ब्लॉग का प्रोफाइल फोटो है. हमरा फोटो को लेकर केतना लोग के अंदर कन्फ्यूजन बना हुआ था. अभी भी हो सकता है पता नहीं. केतना लोग नाराज हो गए “संवेदना के स्वर” पर हमरा फोटो देखकर अउर इहाँ पर वाला फोटो देखकर. ऊ लोग का कहना था कि हम धोखा दिए हैं. बहुत समझाने के बाद ऊ लोग माने.

अउर अब तो ई फोटो हमरा ट्रेड मार्क हो गया है.

शुक्रवार, 24 जून 2011

जसोदा

रूपा जब बहुत खुस होकर ई खबर अपना घर के लोग को फोन पर सुनाई कि ऊ माँ बनने वाली है, त पूरा घर में खुसी का लहर दौड़ गया. मगर खुसी के साथ साथ घर का बुजुर्ग औरत लोग को चिंता भी घेरे हुए था कि परदेस में रूपा कइसे अपना देखभाल करेगी. परदेस में नौकरी करने के कारन आजकल संजुक्त परिबार मजबूरी में भी टूट कर बिखरता जा रहा है. अब अपना सहर से इतना दूर बिआह कर अपने पति के पास अकेले रहना, रूपा का मजबूरी था. अउर ई हालत में घर छोडकर एतना दिन के लिए कोइ बुजुर्ग औरत उसके साथ रहे, ई घर वाला का मजबूरी.

रूपा के बगल में ज्योति का फ़्लैट था. दूनो के आदमी एक्के जगह काम करते थे. आना जाना भी था. रूपा ज्योति को दीदी बोलती थी. मगर दूनो के उम्र में इतना फरक था कि अगर रूपा उसको आंटी भी बोलती तो कोनो अन्तर नहीं पड़ता. ज्योति को जब पता चला तो अचानक ऊ अचानक दीदी से माँ के अबतार में आ गयी. आधा घंटा लेक्चर ई बात पर कि कइसे रहना है अउर कइसे उठना बैठना, चलना फिरना, घूमना टहलना है. रूपा को जो खाना पसंद होता, ऊ फट से ज्योति के घर तैयार. रूपा के घर का लोग भी निश्चिंत हो गया कि चलो कोइ तो है देखभाल करने वाला.

ज्योति का सोभाव ही अइसा था कि रात-बिरात अगर कोनो जरूरत हो तो ज्योति का घंटी बजा दीजिए. आपको दरवाजा खोलने पर ज्योति हमेसा हंसते हुए मिलेगी. लेकिन रूपा के साथ तो अजीब बात देखाई दे रहा था. सब लो दांग था ज्योति का समर्पण देखकर. कारन एही कि ज्योति को अपने कोनो औलाद नहीं था.

देखते देखते टाइम अइसा पार होने लगा कि कहा नहीं जा सकता. रूपा को हस्पताल लेकर जाना, जांच करवाना, दवाई देना, खाना पीना सबका जिम्मा ज्योति के ऊपर था. अइसा बुझाता था कि रूपा का बच्चा उसी के पेट में पल रहा है. रूपा के लिए ऊ कभी दीदी, कभी माँ, कभी सहेली, कभी नर्स बन जाती. खुद रूपा के नैहर अउर ससुराल से उसकी माँ अउर सास तब पहुंचीं जब उसको लेबर रूम में ले जाया गया.

ज्योति हस्पताल के गलियारा में बेचैनी में टहल रही थी. तब अंदर से नर्स निकलकर बोली कि बधाई हो लक्ष्मी आई है! नोर्मल डेलिवरी था इसलिए रूपा होस में बाहर आई. उसी समय ज्योति हस्पताल का बिल जमा करने के लिए काउंटर पर चली गयी.

नर्स बच्चा को जब उसकी सास के गोद में देने लगी तो उसकी सास बोली, “नहीं! सबसे पहिले बच्चा को ज्योति के गोद में दीजिए. ओही ई बच्चा की असली माँ है!”

रूपा सास को पास बोलाकर धीरे से कान में बोली, “नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!”

गुरुवार, 2 जून 2011

एलेमेन्टरी माई डियर वाटसन!

आइये आज आपको एगो अपने पुराना परिचित से मिलवाते हैं. आप में से बहुत सा लोग मिले भी होंगे इनसे, त उनके लिए दोबारा मिलने जइसा होगा. सबसे पाहिले उनका पर्सनाल्टी के बारे में:

साहित्त, दर्सनसास्त्र अउर खगोलसास्त्र का ज्ञान: शून्य
राजनीति का ज्ञान: बहुत कम
बनस्पतिसास्त्र का ज्ञान: बेलाडोना, अफीम अउर जहर के बारे में पूरा जानकारी
भौमिकी (जियोलॉजी) का ज्ञान: मट्टी के बारे में जबर्दस्त जानकारी
रसायनसास्त्र का ज्ञान: पारंगत
एनाटॉमी का ज्ञान: सटीक मगर बेतरतीब
सनसनीखेज साहित्त का ज्ञान: पूरा सताब्दी में घटा हर घटना का गहन अध्ययन
संगीत का ज्ञान: वायलिन बहुत अच्छा बजाना आता है
खेल खेलना: मुक्काबाजी और तलवारबाजी में माहिर
क़ानून का जानकारी: स्थानीय क़ानून का ब्यवहारिक ज्ञान

खगोलसास्त्र का इनका जानकारी एतना शानदार है कि इनको ई भी नहीं पता है कि सोलर सिस्टम का होता है अउर सूरज, पृथिबी अउर चन्द्रमा में से कउन किसके पीछे चक्कर लगाता है. जब इनको बता दिया गया त ई बोले कि बेकारे बता दिए, अब इसको भूलने में टाईम लग जाएगा.
इनका मानना है कि आदमी का दिमाग घर के अंदर छत के नीचे बना हुआ बोंक्स रूम के जईसा होता है. सुरू-सुरू में त जेतना सामान इसमें फेंकिए, सब समा जाता है. बाकी एगो समय अइसनो आता है, जब एगो सामान फेंकिये, त दोसरा सामान बाहर गिर जाता है, चाहे पहिलके सामान अंदर नहीं समाता है. अउर इसमें कोनों जबरदस्ती भी नहीं चलता. उनका कहने का मतलब ई है कि आप अपना दिमाग में ओही बात या जानकारी रखिये जिसका आपको जरूरत है अउर समय पर आपको याद आ जाए. बाकी फालतू सब बाहर कर दीजिए. अब सूरज पृथिबी का चक्कर लगाए कि पृथिबी सूरज का, दिन रात होने में फरक त नहिये होने वाला है.
इतना परिचय के बाद, ई बताने का जरूरत है कहाँ कि उनका नाम शर्लोक होम्स है. सर आर्थर कानन डायल का रचा हुआ महान जासूस. ऊ अपने दोस्त डॉ. वाटसन के साथ मिलकर बहुत सारा अपराध चुटकी में हल कर दिए. हल करने का तरीका एतना साधारण कि “चुटकी में” सब्द मोहावरा नहीं, सचाई लगता था. जूता में लगा हुआ मट्टी देखकर बता देना कि ई आदमी लन्दन के किस हिस्सा से चलकर आ रहा है, आपके आने का समय से ई बताना कि आप कहाँ से आ रहे हैं, काहे कि इस समय ओहीं से गाड़ी सुबह-सुबह आता है. आज भी बहुत सा जासूसी सीरियल इन्हीं का भोंडा नक़ल करके बनता है अउर मसहूर भी होता है. मगर ऊ क्राइम कम कोमेडी जादा लगता है.
सत्यजीत राय भी फेलु दा (प्रदोस चन्द्र मित्तर) के नाम से एगो जासूस का चरित्र गढे थे, जो आज भी मसहूर है. हमरा बेटा त दीवाना है फेलु दा का. बंगाल में सरदेन्दु बंद्योपाध्याय द्वारा रचित ब्योमकेस बक्सी भी घर-घर में जाना जाता है. टीवी पर भी इसका सीरियल देखाया जाता था. ओइसहीं करमचंद, डिटेक्टिव ओंकार नाथ, के.डी.पाठक जैसा केतना जासूस देखाया गया.
बंगाल से याद आया. जब हम कलकत्ता में थे तब एक दिन कोनों दोकान में कुछ खरीदारी करने गए. पांच सौ का नोट था हमरे पास, सो हम दिए. दोकानदार बाकी पैसा हमको लौटाया, त हम सहेजकर पर्स में रखने लगे.
दोकानदार पूछा, “दादा! आपनी की बैंके चाकरी कॉरेन?” (क्या आप बैंक में नौकरी करते हैं?)
उसका उत्तर देने से पहले हम अपने दिमाग को मथ डाले. हम विदेशी-मुद्रा विभाग में काम करते हैं और हमरे इहाँ तो खाता भी नहीं खुलता है. माने इस आदमी का खाता भी हमरे ऑफिस में नहीं हो सकता. न ई हमरे घर के पास का बासिंदा लगता है कि जानता होगा कि हम बैंक के अपार्टमेंट में रहते हैं. सस्पेंस हमसे बर्दास्त नहीं होता है.
हम जवाब में सवाल पूछ लिए, “आपनी की कोरे बूझलेन?” (आपको कैसे पता चला?)
ऊ हंसने लगा. बोला, “ आमी टाका फेरोत दिलूम, त आपनी नोटेर सादा पोर्शन टा एक साइड कोरे शाजिये राखलेन. एई टा बैंकर लोकदेर अभ्येश!”

कमाल का चरित्र था. कहने लगा कि हमरे पैसा वापस करने पर आप जो नोट का सफ़ेद वाला हिस्सा को एक तरफ करके सजा रहे थे, तो हमको लगा कि आप बैंक में काम करते होंगे. उन्हीं लोगों को आदत है ऐसा करने का.

हम मुस्कुरा कर निकल आये दोकान से. सोचते हुए कि ऊ आदमी का नाम का था शर्लोक घोष या फेलू बंदोपाध्याय या ब्योमकेस मित्रा!

बुधवार, 25 मई 2011

कहानी फ़िल्मी नहीं है!

अगर कोनो आदमी, बिना दिन तारीख बताए हुए किसी का घर में चला आवे, त उसको अतिथि कहते हैं. ओइसहीं अगर कोनो अईसन घटना घट जाए जिसका उम्मीद नहीं हो त उसको संजोग कहते हैं. एगो अउर परिभासा है संजोग का जो हमरे घर में बहुत परचलित है. हमलोग संजोग को “सिनेमा जईसा घटना” बोलते हैं. जइसे सनीचर को अचानक हमरा चंडीगढ़ जाने का प्रोगराम बन गया अउर जब हम चैतन्य बाबू के सामने खडा हुए, तो सिनेमा का घटना का जईसा लगा उनको अउर ऊ एकदम अबाक रह गए अउर हमसे हाथो नहीं मिला सके. तनी हमरा पुराना पोस्ट पर नजर दौड़ाइयेगा त याद आ जाएगा कि अनुराग जी से हमरा मुलाक़ात भी एकदम सिनेमा का घटना जईसा हुआ था.

असल में तीन घंटा के भीतर का मालूम केतना साल का खिस्सा देखा देता है सिनेमा में. कभी कभी त पिछला जनम तक का कहानी उसमें रहता है. अब सब बात तीन घंटा में देखाने के कारन, घटना एतना तेजी से घटता है कि बिस्वास नहीं होता है कि जिन्नगी कहीं इतना तेजी से चलता है. एही से सिनेमा का घटना सब संजोग लगता है. एगो रईस बिजनेसमैन, अचानक सड़क पर आ गया, घर नीलाम हो गया, दोस्त धोखा दे गया, बाल-बच्चा नालायक निकल गया अउर ऊ बेचारा दाना-दाना के लिए मोहताज हो गया. संजोग से एगो दोस्त भेटा गया, जो उसको नौकरी दिया अउर मेहनत से सिनेमा के अंत में ऊ फिर से आलीशान कोठी का मालिक. जइसे उनका दिन बहुरा, भगवान सात घर दुसमन का दिन भी बहुराए.

ब्लॉग के दुनिया में एतना फास्ट घटना क्षमा जी के “बिखरे सितारे” पर घटता है. अपना सामाजिक जीबन में, बहुत सा महिला लोग से उनका मुलाक़ात हुआ, बहुत सा बात उनको पता चला, बहुतों का जीबन सुधारने के लिए ऊ कोसिस कीं. अउर उनसे हमलोग का भी परिचय करवाईं. ऊ महिला लोग के जीबन का उथल पुथल देखकर मन बहुत दुखी हो जाता था. उनके पोस्ट पर केतना बार हम कमेन्ट किये कि “ये सारी घटनाएँ, फिल्मी घटनाओं सी लगती हैं. ऐसा लगता है कि सारी दुनिया उस किरदार की दुश्मन बनी बैठी है और सारे दुःख, तकलीफें सिर्फ उसी का इंतज़ार कर रही हैं. आप एक अच्छी पटकथा लिख सकती हैं.” उनके साथ बतियाने में भी ई बात हम उनको बताए कि आपके चरित्र को क्या एक भी अच्छा आदमी नहीं मिलता या एक बार धोखा खाने पर वो कैसे विश्वास कर सकती है दूसरे धोखेबाज़ पर? लेकिन उनका जवाब एक ही होता, “तुम्हारे कहने से मैं उन घटनाओं को नहीं बदल सकती, जो उन महिलाओं के साथ हुई हैं. तुम्हें ये बातें फ़िल्मी भले लगती हों, लेकिन जिनपर बीती हैं, मैं उनकी साक्षी रही हूँ” कभी न उनके बात का हम बुरा माने, न ऊ हमारे बात का बुरा मानीं.

ओशो कहते हैं कि चारों ओर हमारी ही फेंकी हुई ध्वनियाँ प्रतिध्वनित होकर हमें मिल जाती हैं. थोड़ी देर अवश्य लगती है. ध्वनि टकराती है बाहर की दिशाओं से और लौट आती है. जब टक लौटती  है तब तक हमें ख्याल भी नहीं रहता कि हमने जो ध्वनियाँ फेंकी थी, वही वापस लौट रही हैं.

क्षमा जी से कहा हुआ बात इतना जल्दी वापस आ जाएगा कभी सोचे नहीं थे. पीछे एक डेढ़ महीना में आठ साल पुराना लैपटॉप परेसान करने लगा. बनवाए तो एकदम फस्ट क्लास हो गया. मगर एक हफ्ता के बाद दम तोड़ गया बेचारा. सरीर का कोनों अईसा अंग खराब हुआ कि कोइ डोनर नहीं मिला. ईस्वर उसका आत्मा को सांति दे. हमारे दाहिना हाथ का दर्द एतना बढ़ गया कि बर्दास्त करना मोस्किल हो गया. बीमारी सचिन तेंदुलकर वाला अउर कारण ओही लैपटॉप. पता नहीं उसके बीमारी का कारण हम थे कि हमरा बीमारी का कारण ऊ. अभी इसी में ओझराए थे कि एडी का दर्द के चलते, गोड जमीन में धरना दुस्वार. ऑफिस, घर, परिबार सब तरफ से पेंडिंग, सब परेशानी अपना हिसाब मांगने चला आया. इनकम टैक्स बिभाग भी नोटिस भेज दिया कि हम अपना एतना इनकम छुपाए हैं, जेतना ई मामूली तनखाह पाने वाला आदमी का तीन महीना का तनखाह होता है. त हम जो बारह महीना का टैक्स दिए ऊ साल साल में कहीं १५ महीना तो नहीं था!! का मालूम होइयो सकता है.

अंत में हमको मिली क्षमा जी के कहानी वाली औरत. हमरे फ़्लैट के ऊपर रहती थी. एतवार को हमरी बेटी खेलने के लिए निकली, अउर तुरत लौट कर बोली, “डैडी!! ऊपर एक आंटी ने फांसी लगा ली है!” उसको घर में रुकने को बोलकर हम भागकर ऊपर गए. देखे कि हॉल में घर का मालिक (अफ़सोस ऊ हमरे संस्थान में काम करता है) सराब के नसा में धुत्त आराम से बईठा हुआ है. हम अंदर जाकर देखे तो कमरा बंद, अऊर जब दरार से आँख लगाकर देखे त हमरा देह ठंडा हो गया. पंखा से ऊ औरत झूल रही थी. सफाई करने वाला आदमी को जब पता चला त चिल्लाकर भागा था अउर हमरी बेटी सुनी. सोसाइटी के पदाधिकारी होने के नाते अउर सामाजिक होने के नाते पुलिस, पोस्टमार्टम का इंतजाम किये. ऊ आदमी को कोइ होस नहीं. बयान तक नहीं दे पाया पुलिस के सामने. आधा रात के बाद जब आंध्र परदेस से उसकी बेटी आ गयी, तब हम घर लौटे.

मरने वाली के बेटी का रोना अउर तेलुगु में रोते हुए बाप को कोसना अउर माँ को याद करना, हमरे कान में टीस मार रहा था. जब उधर से दिमाग हटा तो हम क्षमा जी को फोन किये और बोले, “आज आपकी कहानी के एक और किरदार से मिला मैं. साल भर से मेरे घर के ऊपर रह रही थी. और सचमुच ये सिनेमा की कहानी नहीं है.”

शनिवार, 7 मई 2011

बिना शीर्षक!!


जब से वो ट्रांसफर होकर यहाँ आया था, तकरीबन एक साल पहले, तब से ही बहुत परेशान रहा करता था. किसी से कुछ बतियाता भी नहीं था और किसी को कुछ बताता भी नहीं था. लोग कहते कि पहली बार घर से बाहर आया है इसलिए होम-सिकनेस है. साल भर के अंदर उसने छुट्टियाँ भी काफी लीं. तब पता चला कि उसका १४-१५ साल का बेटा दिमागी तौर पर बीमार है और कभी कभी तो उसकी तबियत इतनी बिगड जाती है कि बस अब-तब की हालत हो जाती है. इसी वज़ह से कई बार उसे अचानक छुट्टी पर जाना पड़ जाता था.  
यूनियन के नेताओं से बात की, उच्च अधिकारियों को मजबूरी बताई. ये भी बताया कि बेटे का इलाज एक ही डॉक्टर इतने सालों से कर रहा है, इसलिए बच्चे को यहाँ लाकर नए सिरे से इलाज नहीं कराया जा सकता है और दिमाग का मरीज़, बाप के सिवा किसी से संभालता भी नहीं. लेकिन सारी पैरवी बेकार. सबों ने अपनी-अपनी मजबूरी जता दी और कहा कि तीन साल से पहले वापस ट्रांसफर संभव नहीं. उलटे उसे जली-कटी भी सुनने को मिली कि बिना बताए छुट्टी पर चला जाता है. काम की तो कोइ फ़िक्र ही नहीं. इसे तो किसी और मुश्किल जगह पर ट्रांसफर करना पडेगा, तब पता चलेगा.
एक रोज फिर वो इसी तरह गायब हो गया. एक समझदार व्यक्ति ने उसकी सारी समस्या फिर से यूनियन नेताओं को बताई और कहा कि उसके बेटे की हालत बहुत खराब है, जो बाप के पास न रहने से और भी बिगड गयी है. किसी भी तरह से उसका ट्रांसफर वापस उसके शहर करवा दिया जाए तो, बड़ा उपकार होगा उसपर. नेताओं और अधिकारियों ने इस बार सच्चे दिल से उसके बारे में सुना और सोच-विचार किया. फ़ाइल ऊपर बढाई गयी और संकेत मिले कि काम हो जाएगा.
इस बीच वो लौट आया. सर मुंडाए, और भी ज़्यादा उदासी लपेटे. लोगों की समझ में सारी बात आ गयी कि उसका बेटा चल बसा. कई लोगों ने सांत्वना व्यक्त की, कई लोगों ने कहा कि उस बच्चे को कष्ट से मुक्ति मिल गयी. नेताओं ने समझाया कि हमारी भी मजबूरियाँ होती हैं, हम तो कोशिश कर ही रहे थे और फ़ाइल आगे बढ़ भी चुकी थी. वो सबों की बातें चुपचाप सुनता रहा. पहली बार उसकी आँखों से टप-टप आंसू बह रहे थे.
यूनियन के नेता अधिकारियों के पास गए और उनमें बातचीत शुरू हुई.
“चलो अच्छा हुआ उसका बेटा मर गया, सारे ट्रांसफर हो जाने के बाद बीच में किसी का ट्रांसफर करवाना कितना मुश्किल होता है, ये हम ही जानते हैं.”
“फ़ाइल वापस लौटाने का कोइ फायदा नहीं है. एक बार ट्रांसफर की परमिशन आ जाए, तो देखेंगे उसकी जगह किसी अपने आदमी को एडजस्ट कर लेंगे. क्या कमाल का संजोग है!”
पुनश्च: यह मात्र कथा नहीं, एक सत्यकथा है. इसमें पात्रों, शहर, संस्थान आदि के नाम नहीं लिखे हैं, इसलिए किसी से मेल खाने का प्रश्न नहीं उत्पन्न होता है. घटना के मेल होने की स्थिति में इसे भी उसी घटना की श्रेणी में मानें.
(टंकक: सुधीर)

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

समीर लाल + चैतन्य आलोक = चला बिहारी ब्लॉगर बनने


बहुत साल पहले एगो सिनेमा देखे थे “इस रात की सुबह नहीं”. हीरो अपना परेशानी में घिरा होता है और क्लब में दोस्त लोग उसको समझाने का कोसिस कर रहे होते हैं. ऊ नहीं मानता है अउर उठकर जाने लगता है. ओही समय कोइ पीछे से उसके कंधा पर हाथ रखता है अउर हीरो गुस्सा में उसको थप्पड़ मार देता है. जिसको थप्पड़ लगा ऊ सहर का मसहूर गुंडा था अउर ऊ भी बहुत परेसान हालत में था. पूरा पब्लिक के बीच में थप्पड़ लगने से ऊ गोस्सा में आग बबूला हो गया अउर हीरो को खतम करने के लिए तत्पर हो गया. सिनेमा एही भाग दौड का कहानी था. गुंडा को थप्पड़ लगने का गुस्सा ओतना नहीं था, जेतना पब्लिकली थप्पड़ लगने का था.
ब्लॉग जगत में तब हमलोग नया नया आए थे... बहुत अरमान, बहुत सपना, बहुत आसा लेकर. सायद एतना सपना कोइ दुल्हिन भी नया-नया ससुराल में पहिला कदम धरते समय नहीं देखती होगी. सबकुछ चकाचौंध कर देने वाला. मन लगाकर लिखना अउर छोटा से छोटा कमेन्ट पर भी फूला नहीं समाना. ऐसा में मनोज कुमार जी का “विचारोत्तेजक” अउर समीर लाल जी का “अच्छी प्रस्तुति” भी मन को आनंद पहुंचाता था. समीर लाल जी का नाम कुछ दिन के अंदर हमारे लिए “ए हाउसहोल्ड नेम” बन गया.
तब एतना भी समझ नहीं था कि ब्लॉग लिखने वाला बड़ा लोग लिखता कुछ है, उसका मतलब कुछ अउर होता है, निशाना कहीं अउर होता है. हमको लगता था कि भावार्थ हमारे समझ में नहीं आ सकता है, मगर उसका पूरा का पूरा माने हमरे समझ में नहीं आए इतना तो बेबकूफ नहिंये हैं हम. अइसहीं एक दिन समीर लाल जी के “उड़न तश्तरी” पर एगो पोस्ट देखाई दिया. उसका भाबार्थ जो हम समझे (आज सर्मिन्दा होते हैं अपना सोच पर) ऊ हमको बहुत चोट पहुंचाने वाला लगा. ऊ कहते हैं न कि मन में बसा हुआ मूर्ति खंडित होने जईसा तकलीफ हुआ (अतिशयोक्ति नहीं है).
हम बोले कि हम जाकर लिखेंगे कि ई गलत बात है समीर बाबू. तब लगा कि हमरा नया-नया “सम्बेदना के स्वर” का गला न दब जाए कहीं. इतना बड़ा आदमी से ओझराने का मतलब – खल्लास!! सोचे बेनामी टिप्पणी करते हैं. मगर तब तक बेनामी का मतलब बुझाने लगा था. बिचार हुआ अउर फैसला लिया गया कि एगो ब्लॉग बनाकर उसी से कमेन्ट करके अपना बिरोध दर्ज किया जाए. काहे से कि सबलोग उनका लिखा का तारीफ छोड़कर कुछ कहा नहीं था. चैतन्य बाबू सलाह दिए कि आप अपना बिहारी बोली में काहे नहीं कमेन्ट करते हैं (पाहिले तो ऊ मना किये थे कमेन्ट करने के लिए, मगर हमरे जिद को टाल नहीं पाए). हमको भी ई आइडिया जंच गया.
हम जब भी कुछ लिखते हैं, त उसका सीर्सक चैतन्य बाबू देते हैं. हम कहते भी हैं कि हमारे दिमाग में जब प्रसब पीड़ा होता है अउर रचना का जन्म होता है, तो उसका नामकरण आपके ही हाथ से होता है. बस ऊ बेनामी ब्लॉग का नाम चैतन्य जी रख दिए “चला बिहारी ब्लोगर बनने”. समीर जी के साथ कमेन्ट को लेकर बहस हुआ. गुरुदेव सतीस सक्सेना जी उनके बचाव में खड़े हो गए. समीर जी पता लगा लिए कि हम कौन हैं अउर हमरा माथा हल्का हो गया कि बेनामी को नाम मिल गया अउर ऊ भी ब्लॉग जगत के डॉन के मार्फ़त. अच्छा सम्बन्ध रहा समीर जी के साथ. जब दिल्ली आए तो ऊ अपने एगो कोमन दोस्त के मार्फ़त अपना प्रोग्राम बताए. हम बोले, “उनसे मिलने वालों की कतार लगी होगी, पता नहीं मेरा नंबर कब आएगा”. समीर जी का जवाब था, “उनको कहना, उनका नंबर पहला होगा.” मिले उनसे, बहुत जिंदादिली से. अउर उसी दिन उनको अपने मन का बात बताए कि जो कहिये हमरे ब्लॉग के जनक आप ही हैं.
सुरू में तो काफी दिन बेनामी बने रहे. फिर लगा कि बेनामी बने रहने में कोनों फायदा नहीं है. अउर खाली टिप्पणी करने के लिए ब्लॉग सुरू किया तो धिक्कार है हमरे की बोर्ड पर! चैतन्य जी का सुझाव आया कि ब्यक्तिगत अनुभव लिखो. हम भी सोचे कि “संवेदना के स्वर” से अलग लगना चाहिए. अउर तब हम सुरू किये अपना याद का गठरी खोलना. अईसा अनुभव, जो हमरा होने पर भी सबका मालूम पड़े. हमरे बात से लोग को अपना बात याद आये. मजा आने लगा. बहुत अच्छा लगा कि कब ब्लॉग के माध्यम से दुनिया से जुड़े, दुनिया से नया नया रिश्ता बना, दुःख तकलीफ भी बांटे अउर दोस्ती प्यार भी फैलाने का कोसिस किये. हमरे घर का लोग भी हैरान. बच्चा लोग को नया-नया घटना का पता चला अउर पुराना लोग का याद ताजा हो गया. माताजी, भाई-बहन का कहना था कि सब घटना जाना हुआ है, मगर तुम जब कहते हो तो लगता है कि बस कल का बात है.
फिलिम “आँधी” में संजीव कुमार टेलीफोन पर सुचित्रा सेन को एगो नज़्म सुनाते हैं तो उनके बीच का बातचीत सुनिए:
“वंडरफुल! ब्यूटीफुल!”
“एक बात बताऊँ, तुम जब अच्छा कहती हो ना, तो सचमुच बहुत अच्छा लगता है!”
बस एही कहना चाहते है हम भी आप लोग से कि जब आप लोग हमरे बात से अपना कोइ बात याद करके अच्छा कहते हैं ना, तो सच्चो हमको बहुत अच्छा लगता है. कम से कम पिछला एक साल से तो एही देख रहे हैं. बिस्वास कीजिये आज हमरे ब्लॉग का एक साल पूरा हो गया है!!

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

प्रशंसक या प्रशंसिका ?

हाथ गोड़ का दरद से पहिलहीं परेसान थे, उसपर से माथा का दरद बन गया ई मोबाइल पर आने वाला एस.एम्.एस. कोई मकान खरीद लेने का जिद किये जा रहा है, कोई एकदम सस्ता कम्प्युटर खरीदने का सलाह दे रहा है, पंडित जी भबिस बांच रहे हैं, कोनो कोनों तो हमरे घर से दीमक अउर तिलचट्टा साफ़ करने पर तुला हुआ है. अरे भाई, एतने सौख है दीमक अउर तिलचट्टा मारने का तो देस से काहे नहीं सफाई करते हो दीमक का जो एतना साल से चाटे जा रहा देस को! हमको बख्स दो भाई, हमरी घरवाली बहुत सफाई पसंद है.

ई सब एस.एम्.एस. के चक्कर में केतना ऑफिस का जरूरी संदेस अउर बहुत सा दोस्त लोग का प्रेरक जीवन सूत्र भी ओही सब २ बीएचके/३ बीएचके में दब जाता है. एगो दोस्त तो एतना प्रेरणादायक हैं कि भोरे गुड मोर्निंग से लेकर, गुड आफ्टरनून, गुड ईभनिंग अउर रात को गुड नाईट के लिए भी मेसेज भेजते हैं. ऊ का कहते हैं डेल कार्नेगी अउर सिव खेडा के बाद हमरे ऊ दोस्त का नंबर आता है. इन फैक्ट उनका मेसेज पढ़ने के बाद हमको लगा कि हमरा तो सारा जिन्नगी ब्यर्थ हो गया अउर हमरे हर असफलता का कारण एही है कि उनका एस.एम्.एस. हमको बचपन से प्राप्त नहीं हुआ. नहीं तो हम भी पार्लियामेंट में बईठकर अंगूठा लगा रहे होते.

खैर, डॉक्टर बोला है कि ऊंगली अउर कलाई का ब्यायाम कीजिये, फायदा होगा. सो हम बइठ गए, ब्यायाम करने, मोबाइल हाथ में लेकर १७५ मेसेज डिलीट करने, इन्क्लूडिंग दोज ऑफ माई फ्रेंड’स. सायद इससे अच्छा ब्यायाम कोनों हो भी नहीं सकता था. फालतू का मेसेज मिटाते हुए एतना खुसी महसूस हो रहा था कि अगर पौराणिक सिनेमा के दैत्य होते, चाहे हिन्दी सिनेमा के खलनायक, तो अट्टहास लगा रहे होते, एक एक मेसेज के खतम होने पर.

अचानके एगो मेसेज पर नजर पड़ा. भेजने वाले का नाम के जगह नंबर था, मतलब हमरे लिस्ट से बाहर का कोइ अदमी था. लिखा था, “आपका ब्लॉग आपकी तरह क्यूट है – सुमन शर्मा.” हमरा हाथ रुक गया. तुरते हमरा नजर कमरा में लगा हुआ आदमकद आईना पर गया. हम अउर क्यूट! ऊ भी बुढापा में!! हाथ अपने आप बाल में फेरकर आईना के तरफ से नजर फेर लिए. अउर तब हमरे अंदर का एसीपी प्रद्युमन सोचने लगा कि इसको हमरा नंबर कहाँ से मिला, अगर इसको तारीफ़ करना था तो हमरे पोस्ट के ऊपर काहे नहीं किया, कमेन्ट में कोनों पोस्ट के बारे में कुछ काहे नहीं लिखा.

हम तुरत फोन लगाए सीनियर इन्स्पेक्टर अभिजीत को.. अपने चैतन्य बाबू. ऊ भी हैरान. हंसकर बोले, “आपके चाहने वाले बढते जा रहे हैं.” हम बोले, “मगर पता तो चले कि हैं कौन.” लीजिए, इन्स्पेक्टर साहब अउर एगो सक का कीड़ा डाल दिए दिमाग में, बोले, “कहीं कोई महिला तो नहीं.” हमरा तो मिजाजे सन्न हो गया. ई तो हम सोचबे नहीं किये थे. एक बार अउर आईना में मुंह देखे कि कोइ महिला हमको क्यूट काहे बोलेगी भाई, ऊ भी हमारा ब्लॉग का प्रोफाइल फोटो देखने के बाद. हम बोले, “हो सकता है. शशि दोनों के नाम होते हैं, सुमन भी कोमन नाम है. चलो फोन करके संदेह दूर करते हैं.”

फोन किये, घंटी बजता रहा, कोई जवाब नहीं. मोबाइल से किये, लैंडलाइन से किये. मगर उधर से कोनों जवाब नहीं. अब सस्पेंस बढ़ने लगा. एतना सस्पेंस तो हम ब्लॉग पर अपने प्रियजन के धारावाहिक कहानी में भी नहीं झेल पाते हैं. ओहाँ तो कम से कम क्रमशः लिखा होता है, इहाँ तो कुच्छो नहीं. हम मेसेज का जवाब मेसेज से दे दिए कि आप जो भी हैं ज़रा सामने तो आओ छलिये. अउर फोन तो उठा लिया करें.

दोसरा दिन फिर हम फोन करते रहे, घंटी बजता रहा अउर जवाब नहीं. मोबाइल में देखे कि एगो मेसेज आया हुआ था, “अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखिये.” हमको लगा कि हम पगला जाएंगे. भाई मेरे अगर तुम पुरुस हो तो हमरे पोस्ट पर कमेन्ट करो कि स्वास्थ्य का ख्याल रखें. अउर महिला हैं तो काहे मेसेज कर रही हैं जब बात से परहेज है.

कल ऑफिस से लौटते टाइम मेट्रो में अचानक फिर से दिमाग में ओही सवाल परेसान करने लगा. फोन मिलाए. घंटी बजता रहा अउर अचानक उधर से मरदाना आवाज सुनाई दिया. हम एकदम से खीझ गए अपने ऊपर, काहे कि ऊ चैतन्य जी का आवाज था. जल्दी में उनका नंबर मिला दिए. ऊ बोले, “घबरा क्यों रहे हैं सर! मैं सुमन शर्मा ही बोल रहा हूँ. आपने सही नंबर मिलाया है.”

“लेकिन ये नंबर...”

“आपको बताया था कि नया फोन लिया है मैंने, लेकिन उसके साथ नया कनेक्शन मिला है, ये नहीं बताया आपको. जब एक्टिवेट हुआ तो सोचा मजाक कर लूं आपके साथ.”

हम दोनों हँस दिए. हमरा माथा हल्का हुआ.

(आभार: इस पोस्ट को टाइप करने के लिए मैं आभारी हूँ अपने मित्र सुधीर जी का)